Love Poetry (page 163)
'ग़ालिब' को बुरा क्यूँ कहो
दिलावर फ़िगार
इलिएट्स-गर्ल्स-कॉलेज और कुल पाक ओ हिन्द मुशाएरा
दिलावर फ़िगार
क्रिकेट और मुशाइरा
दिलावर फ़िगार
चोर-साहिब से दरख़्वास्त
दिलावर फ़िगार
चालीस चोर
दिलावर फ़िगार
अल्लामा-'इक़बाल' को शिकवा
दिलावर फ़िगार
अहमक़ों की कांफ्रेंस
दिलावर फ़िगार
या रब मिरे नसीब में अक्ल-ए-हलाल हो
दिलावर फ़िगार
वो शख़्स कभी जिस ने मिरा घर नहीं देखा
दिलावर फ़िगार
उट्ठी नहीं है शहर से रस्म-ए-वफ़ा अभी
दिलावर फ़िगार
सियाह ज़ुल्फ़ को जो बन-सँवर के देखते हैं
दिलावर फ़िगार
न मिरा मकाँ ही बदल गया न तिरा पता कोई और है
दिलावर फ़िगार
जादा-ए-फ़न में बड़े सख़्त मक़ाम आते हैं
दिलावर फ़िगार
हुस्न पर ए'तिबार हद कर दी
दिलावर फ़िगार
अमरीका शेर पढ़ने गए थे हमारे दोस्त
दिलावर फ़िगार
चाँद तारे तो मिरे बस में नहीं हैं 'आज़र'
दिलावर अली आज़र
वो बहते दरिया की बे-करानी से डर रहा था
दिलावर अली आज़र
सात दरियाओं का पानी है मिरे कूज़े में
दिलावर अली आज़र
नींद में खुलते हुए ख़्वाब की उर्यानी पर
दिलावर अली आज़र
मुमकिन है कि मिलते कोई दम दोनों किनारे
दिलावर अली आज़र
मंज़र से उधर ख़्वाब की पस्पाई से आगे
दिलावर अली आज़र
लम्हा लम्हा वुसअत-ए-कौन-ओ-मकाँ की सैर की
दिलावर अली आज़र
कुछ भी नहीं है ख़ाक के आज़ार से परे
दिलावर अली आज़र
ख़ुद अपनी आग में सारे चराग़ जलते हैं
दिलावर अली आज़र
खींच कर अक्स फ़साने से अलग हो जाओ
दिलावर अली आज़र
कब तक फिरूंगा हाथ में कासा उठा के मैं
दिलावर अली आज़र
दूर के एक नज़ारे से निकल कर आई
दिलावर अली आज़र
दरून-ए-ख़्वाब नया इक जहाँ निकलता है
दिलावर अली आज़र
बोझ उठाए हुए दिन रात कहाँ तक जाता
दिलावर अली आज़र
अक्स मंज़र में पलटने के लिए होता है
दिलावर अली आज़र