Love Poetry (page 161)
जब रुख़-ए-हुस्न से नक़ाब उठा
एहसान दानिश
जब भी ख़ल्वत में वो याद आएगा
एहसान दानिश
इश्क़ को तक़लीद से आज़ाद कर
एहसान दानिश
इश्क़ की दुनिया में इक हंगामा बरपा कर दिया
एहसान दानिश
हंगामा-ए-ख़ुदी से तू बे-नियाज़ हो जा
एहसान दानिश
दिल की रग़बत है जब आप ही की तरफ़
एहसान दानिश
बना देंगी दुनिया को इक दिन शराबी
एहसान दानिश
बख़्श दी हाल-ए-ज़बूँ ने जल्वा-सामानी मुझे
एहसान दानिश
अपनी रुस्वाई का एहसास तो अब कुछ भी नहीं
एहसान दानिश
अब कहो कारवाँ किधर को चले
एहसान दानिश
आया नहीं है राह पे चर्ख़-ए-कुहन अभी
एहसान दानिश
पत्थर न बना दे मुझे मौसम की ये सख़्ती
डॉ. पिन्हाँ
ज़ख़्म शादाब देखते हैं मुझे
डॉ. पिन्हाँ
मंज़र है अभी दूर ज़रा हद्द-ए-नज़र से
डॉ. पिन्हाँ
शौक़ बाक़ी नहीं बाक़ी नहीं अब जोश-ओ-ख़रोश
डॉक्टर आज़म
पुर-लुत्फ़ सुकूँ-बख़्श हवाएँ भी बहुत थीं
डॉक्टर आज़म
मिसाल-ए-आईना रहना कोई मज़ाक़ नहीं
डॉक्टर आज़म
मेरी मिट्टी में जब न था पत्थर
डॉक्टर आज़म
ख़ुदा भी जानता है ख़ूब जो मक्कार बैठे हैं
डॉक्टर आज़म
जो अना की सिफ़त है ज़ाती है
डॉक्टर आज़म
झुर्रियों की क़तार देखो तो
डॉक्टर आज़म
हर शख़्स में कुछ लोग कमी ढूँड रहे हैं
डॉक्टर आज़म
दिल मिरा चीख़ रहा था शायद
डॉक्टर आज़म
बुलंद फ़िक्र की हर शे'र से अयाँ हो रमक़
डॉक्टर आज़म
अफ़सोस बनी ही नहीं पहचान अभी तक
डॉक्टर आज़म
ज़रा भी शोर मौजों का नहीं है
दिवाकर राही
कुछ आदमी समाज पे बोझल हैं आज भी
दिवाकर राही
हज़ारों बार कह कर बेवफ़ा को बा-वफ़ा मैं ने
दिवाकर राही
क्या किसी की तलब नहीं होती
दिनेश ठाकुर
कभी आँसू कभी ख़्वाबों के धारे टूट जाते हैं
दिनेश ठाकुर