Love Poetry (page 172)
वो ज़माना नज़र नहीं आता
दाग़ देहलवी
उज़्र उन की ज़बान से निकला
दाग़ देहलवी
उस के दर तक किसे रसाई है
दाग़ देहलवी
उस से क्या ख़ाक हम-नशीं बनती
दाग़ देहलवी
उन के इक जाँ-निसार हम भी हैं
दाग़ देहलवी
तुम आईना ही न हर बार देखते जाओ
दाग़ देहलवी
तेरी सूरत को देखता हूँ मैं
दाग़ देहलवी
सितम ही करना जफ़ा ही करना निगाह-ए-उल्फ़त कभी न करना
दाग़ देहलवी
शब-ए-वस्ल ज़िद में बसर हो गई
दाग़ देहलवी
शब-ए-वस्ल भी लब पे आए गए हैं
दाग़ देहलवी
साज़ ये कीना-साज़ क्या जानें
दाग़ देहलवी
साफ़ कब इम्तिहान लेते हैं
दाग़ देहलवी
सब लोग जिधर वो हैं उधर देख रहे हैं
दाग़ देहलवी
क़रीने से अजब आरास्ता क़ातिल की महफ़िल है
दाग़ देहलवी
पुकारती है ख़मोशी मिरी फ़ुग़ाँ की तरह
दाग़ देहलवी
फिरे राह से वो यहाँ आते आते
दाग़ देहलवी
पयामी कामयाब आए न आए
दाग़ देहलवी
ना-रवा कहिए ना-सज़ा कहिए
दाग़ देहलवी
मुमकिन नहीं कि तेरी मोहब्बत की बू न हो
दाग़ देहलवी
मुझे ऐ अहल-ए-काबा याद क्या मय-ख़ाना आता है
दाग़ देहलवी
मुझ सा न दे ज़माने को परवरदिगार दिल
दाग़ देहलवी
मोहब्बत में आराम सब चाहते हैं
दाग़ देहलवी
मोहब्बत का असर जाता कहाँ है
दाग़ देहलवी
मिन्नतों से भी न वो हूर-शमाइल आया
दाग़ देहलवी
मिलाते हो उसी को ख़ाक में जो दिल से मिलता है
दाग़ देहलवी
मज़े इश्क़ के कुछ वही जानते हैं
दाग़ देहलवी
लुत्फ़ वो इश्क़ में पाए हैं कि जी जानता है
दाग़ देहलवी
क्या तर्ज़-ए-कलाम हो गई है
दाग़ देहलवी
कुछ लाग कुछ लगाव मोहब्बत में चाहिए
दाग़ देहलवी
खुलता नहीं है राज़ हमारे बयान से
दाग़ देहलवी