Love Poetry (page 170)

मैं नफ़ी में

दानियाल तरीर

एक सब आग एक सब पानी

दानियाल तरीर

शहर से क्या गई जानिब-ए-दश्त-ए-ज़र ज़िंदगी फ़ाख़्ता

दानियाल तरीर

साकित हो मगर सब को रवानी नज़र आए

दानियाल तरीर

पानी के शीशों में रक्खी जाती है

दानियाल तरीर

नई नई सूरतें बदन पर उजालता हूँ

दानियाल तरीर

मिट्टी था और दूध में गूँधा गया मुझे

दानियाल तरीर

ख़्वाब-कारी वही कमख़्वाब वही है कि नहीं

दानियाल तरीर

ख़्वाब जज़ीरा बन सकते थे नहीं बने

दानियाल तरीर

जरस और सारबानों तक पहुँचना चाहता है

दानियाल तरीर

गया कि सैल-ए-रवाँ का बहाव ऐसा था

दानियाल तरीर

चाँद छूने की तलबगार नहीं हो सकती

दानियाल तरीर

आग में जलते हुए देखा गया है

दानियाल तरीर

साक़ी मुझे शबाब का रसिया कहे सो हूँ

दानिश नज़ीर दानी

शीशे से ज़ियादा नाज़ुक था ये शीशा-ए-दिल जो टूट गया

दानिश फ़राही

न वो ताएरों का जमघट न वो शाख़-ए-आशियाना

दानिश फ़राही

न सोचें अहल-ए-ख़िरद मुझ को आज़माने को

दानिश फ़राही

किस क़दर इज़्तिराब है यारो

दानिश फ़राही

दुआ हमारी कभी बा-असर नहीं होती

दानिश फ़राही

दिल था बे-कैफ़ मोहब्बत की ख़ता से पहले

दानिश फ़राही

ज़र्रे ज़र्रे में महक प्यार की डाली जाए

दानिश अलीगढ़ी

तेरे फ़िराक़ ने की ज़िंदगी अता मुझ को

दानिश अलीगढ़ी

रूदाद-ए-शब-ए-ग़म यूँ डरता हूँ सुनाने से

दानिश अलीगढ़ी

ज़िंदगी कर गई तूफ़ाँ के हवाले मुझ को

दानिश अलीगढ़ी

ज़र्रे ज़र्रे में महक प्यार की डाली जाए

दानिश अलीगढ़ी

वाइज़ तू अगर उन के कूचे से गुज़र जाए

दानिश अलीगढ़ी

क्या ख़बर थी मुन्हरिफ़ अहल-ए-जहाँ हो जाएँगे

दानिश अलीगढ़ी

अगर मैं उन की निगाहों से गिर गया होता

दानिश अलीगढ़ी

इश्क़ की राहों में आया है इक ऐसा भी मक़ाम

दामोदर ठाकुर ज़की

उन के मिलने का ब-ज़ाहिर तो यक़ीं कोई नहीं

दामोदर ठाकुर ज़की