Love Poetry (page 171)

बुलंद ज़ीस्त का अपनी वक़ार हो न सका

दामोदर ठाकुर ज़की

ज़माना दोस्ती पर इन हसीनों की न इतराए

दाग़ देहलवी

वादा झूटा कर लिया चलिए तसल्ली हो गई

दाग़ देहलवी

ठोकर भी राह-ए-इश्क़ में खानी ज़रूर है

दाग़ देहलवी

सितम ही करना जफ़ा ही करना निगाह-ए-उल्फ़त कभी न करना

दाग़ देहलवी

शोख़ी से ठहरती नहीं क़ातिल की नज़र आज

दाग़ देहलवी

शब-ए-वस्ल ज़िद में बसर हो गई

दाग़ देहलवी

शब-ए-वस्ल की क्या कहूँ दास्ताँ

दाग़ देहलवी

शब-ए-विसाल है गुल कर दो इन चराग़ों को

दाग़ देहलवी

साथ शोख़ी के कुछ हिजाब भी है

दाग़ देहलवी

सब लोग जिधर वो हैं उधर देख रहे हैं

दाग़ देहलवी

मुअज़्ज़िन ने शब-ए-वस्ल अज़ाँ पिछले पहर

दाग़ देहलवी

लज़्ज़त-ए-इश्क़ इलाही मिट जाए

दाग़ देहलवी

क्यूँ वस्ल की शब हाथ लगाने नहीं देते

दाग़ देहलवी

कोई छींटा पड़े तो 'दाग़' कलकत्ते चले जाएँ

दाग़ देहलवी

कहने देती नहीं कुछ मुँह से मोहब्बत मेरी

दाग़ देहलवी

जली हैं धूप में शक्लें जो माहताब की थीं

दाग़ देहलवी

इफ़्शा-ए-राज़-ए-इश्क़ में गो ज़िल्लतें हुईं

दाग़ देहलवी

हम भी क्या ज़िंदगी गुज़ार गए

दाग़ देहलवी

हज़ारों काम मोहब्बत में हैं मज़े के 'दाग़'

दाग़ देहलवी

हसरतें ले गए इस बज़्म से चलने वाले

दाग़ देहलवी

इक अदा मस्ताना सर से पाँव तक छाई हुई

दाग़ देहलवी

दिल में समा गई हैं क़यामत की शोख़ियाँ

दाग़ देहलवी

दिल दे तो इस मिज़ाज का परवरदिगार दे

दाग़ देहलवी

दी शब-ए-वस्ल मोअज़्ज़िन ने अज़ाँ पिछली रात

दाग़ देहलवी

बे-ज़बानी ज़बाँ न हो जाए

दाग़ देहलवी

बने हैं जब से वो लैला नई महमिल में रहते हैं

दाग़ देहलवी

अब तो बीमार-ए-मोहब्बत तेरे

दाग़ देहलवी

ज़ाहिद न कह बुरी कि ये मस्ताने आदमी हैं

दाग़ देहलवी

ये बात बात में क्या नाज़ुकी निकलती है

दाग़ देहलवी