Love Poetry (page 174)

अभी हमारी मोहब्बत किसी को क्या मालूम

दाग़ देहलवी

अब वो ये कह रहे हैं मिरी मान जाइए

दाग़ देहलवी

आरज़ू है वफ़ा करे कोई

दाग़ देहलवी

आप का ए'तिबार कौन करे

दाग़ देहलवी

चेहरे पे नूर-ए-सुब्ह सियह गेसुओं में रात

दाएम ग़व्वासी

बाब-ए-रहमत पे दुआ गिर्या-कुनाँ हो जैसे

दाएम ग़व्वासी

यूँही जलाए चलो दोस्तो भरम के चराग़

डी. राज कँवल

नज़रों के गिर्द यूँ तो कोई दायरा न था

डी. राज कँवल

लोग जिन को आज तक बार-ए-गराँ समझा किए

डी. राज कँवल

किसी ने बा-वफ़ा समझा किसी ने बेवफ़ा समझा

डी. राज कँवल

खुलती है चाँदनी जहाँ वो कोई बाम और है

डी. राज कँवल

इंसान नहीं वो जो गुनहगार नहीं हैं

डी. राज कँवल

हम को छेड़ा तो मचल जाएँगे अरमाँ की तरह

डी. राज कँवल

दुनिया पत्थर फेंक रही है झुँझला कर फ़र्ज़ानों पर

डी. राज कँवल

दुनिया में दिल लगा के बहुत सोचते रहे

डी. राज कँवल

हर अदा मश्कूक तेरी मुश्तबा हर बात है

चूँचाल सियालकोटी

ये हादसा मिरी आँखों से गर नहीं होता

चित्रांश खरे

मोहब्बत की गली से हम जहाँ हो कर निकल आए

चित्रांश खरे

लोग सारे भले नहीं होते

चित्रांश खरे

काएनात-ए-आरज़ू में हम बसर करने लगे

चित्रांश खरे

जो मेरी छत का रस्ता चाँद ने देखा नहीं होता

चित्रांश खरे

हमारे सब्र का इक इम्तिहान बाक़ी है

चित्रांश खरे

दोनों की आरज़ू में चमक बरक़रार है

चित्रांश खरे

इक इश्क़ का ग़म आफ़त और उस पे ये दिल आफ़त

चराग़ हसन हसरत

आओ हुस्न-ए-यार की बातें करें

चराग़ हसन हसरत

ये मायूसी कहीं वज्ह-ए-सुकून-ए-दिल न बन जाए

चराग़ हसन हसरत

या-रब ग़म-ए-हिज्राँ में इतना तो किया होता

चराग़ हसन हसरत

मोहब्बत किस क़दर यास-आफ़रीं मालूम होती है

चराग़ हसन हसरत

जब से तेरा करम है बंदा-नवाज़

चराग़ हसन हसरत

इस तरह कर गया दिल को मिरे वीराँ कोई

चराग़ हसन हसरत