Love Poetry (page 182)

न क़रीब आ न तो दूर जा ये जो फ़ासला है ये ठीक है

भवेश दिलशाद

मिलती मुद्दत में है और पल में हँसी जाती है

भवेश दिलशाद

कभी तो सामने आ बे-लिबास हो कर भी

भवेश दिलशाद

न बोसा लेने देते हैं न लगते हैं गले मेरे

भारतेंदु हरिश्चंद्र

मर गए हम पर न आए तुम ख़बर को ऐ सनम

भारतेंदु हरिश्चंद्र

हो गया लाग़र जो उस लैला-अदा के इश्क़ में

भारतेंदु हरिश्चंद्र

गुलाबी गाल पर कुछ रंग मुझ को भी जमाने दो

भारतेंदु हरिश्चंद्र

ग़ाफ़िल इतना हुस्न पे ग़र्रा ध्यान किधर है तौबा कर

भारतेंदु हरिश्चंद्र

उठा के नाज़ से दामन भला किधर को चले

भारतेंदु हरिश्चंद्र

रहे न एक भी बेदाद-गर सितम बाक़ी

भारतेंदु हरिश्चंद्र

फिर आई फ़स्ल-ए-गुल फिर ज़ख़्म-ए-दिल रह रह के पकते हैं

भारतेंदु हरिश्चंद्र

ख़याल-ए-नावक-ए-मिज़्गाँ में बस हम सर पटकते हैं

भारतेंदु हरिश्चंद्र

ग़ज़ब है सुर्मा दे कर आज वो बाहर निकलते हैं

भारतेंदु हरिश्चंद्र

गले मुझ को लगा लो ऐ मिरे दिलदार होली में

भारतेंदु हरिश्चंद्र

फ़साद-ए-दुनिया मिटा चुके हैं हुसूल-ए-हस्ती मिटा चुके हैं

भारतेंदु हरिश्चंद्र

दिल मिरा तीर-ए-सितम-गर का निशाना हो गया

भारतेंदु हरिश्चंद्र

दिल आतिश-ए-हिज्राँ से जलाना नहीं अच्छा

भारतेंदु हरिश्चंद्र

दश्त-पैमाई का गर क़स्द मुकर्रर होगा

भारतेंदु हरिश्चंद्र

बुत-ए-काफ़िर जो तू मुझ से ख़फ़ा है

भारतेंदु हरिश्चंद्र

बैठे जो शाम से तिरे दर पे सहर हुई

भारतेंदु हरिश्चंद्र

बाल बिखेरे आज परी तुर्बत पर मेरे आएगी

भारतेंदु हरिश्चंद्र

अजब जौबन है गुल पर आमद-ए-फ़स्ल-ए-बहारी है

भारतेंदु हरिश्चंद्र

आ गई सर पर क़ज़ा लो सारा सामाँ रह गया

भारतेंदु हरिश्चंद्र

तू हमेशा माँगता रहता है क्यूँ ग़म से नजात

भारत भूषण पन्त

सब ने होंटों से लगा कर तोड़ डाला है मुझे

भारत भूषण पन्त

रिश्तों के जब तार उलझने लगते हैं

भारत भूषण पन्त

क़ुर्बतें नहीं रक्खीं फ़ासला नहीं रक्खा

भारत भूषण पन्त

पराया लग रहा था जो वही अपना निकल आया

भारत भूषण पन्त

मुस्तक़िल रोने से दिल की बे-कली बढ़ जाएगी

भारत भूषण पन्त

मिरी ही बात सुनती है मुझी से बात करती है

भारत भूषण पन्त