Love Poetry (page 180)
मिल चुका महफ़िल में अब लुत्फ़-ए-शकेबाई मुझे
बिस्मिल इलाहाबादी
किसी तरह भी किसी से न दिल लगाना था
बिस्मिल इलाहाबादी
जो न करना था किया जो कुछ न होना था हुआ
बिस्मिल इलाहाबादी
जीने वाला ये समझता नहीं सौदाई है
बिस्मिल इलाहाबादी
इतना भी न साक़ी होश रहा पी कर ये हमें मय-ख़ाना था
बिस्मिल इलाहाबादी
आज़ार-ओ-जफ़ा-ए-पैहम से उल्फ़त में जिन्हें आराम नहीं
बिस्मिल इलाहाबादी
हर सम्त है वीरानी सी वीरानी का आलम
बिस्मिल आग़ाई
सब उम्र तो जारी नहीं रहता है सफ़र भी
बिस्मिल आग़ाई
कितना अजीब शब का ये मंज़र लगा मुझे
बिस्मिल आग़ाई
क्या रौशनी-ए-हुस्न-ए-सबीह अंजुमन में है
बिशन नरायण दराबर
जिन पर निसार शम्स-ओ-क़मर आसमाँ के हैं
बिशन नरायण दराबर
ज़ब्त-ए-नाला दिल-ए-फ़िगार न कर
बिर्ज लाल रअना
मोहब्बत नग़्मा भी है साज़ भी है
बिर्ज लाल रअना
ख़याल को ज़ौ नज़र को ताबिश नफ़स को रख़शंदगी मिलेगी
बिर्ज लाल रअना
दुनिया में वफ़ा-केश बशर ढूँढ रहा हूँ
बिर्ज लाल रअना
आप अपने रक़ीब हैं हम लोग
बिर्ज लाल रअना
तुम तो कुछ ऐसे भूल गए हो जैसे कभी वाक़िफ़ ही नहीं थे
बिमल कृष्ण अश्क
प्यार है वो
बिमल कृष्ण अश्क
यूँ न जान अश्क हमें जो गया बाना न मिला
बिमल कृष्ण अश्क
उन की गोद में सर रख कर जब आँसू आँसू रोया था
बिमल कृष्ण अश्क
तुझ जैसा इक आँचल चाहूँ अपने जैसा दामन ढूँडूँ
बिमल कृष्ण अश्क
मिरी भी मान मिरा अक्स मत दिखा मुझ को
बिमल कृष्ण अश्क
किधर जाऊँ कहीं रस्ता नहीं है
बिमल कृष्ण अश्क
कैसे कहें कि चार तरफ़ दायरा न था
बिमल कृष्ण अश्क
जिस की हर बात में क़हक़हा जज़्ब था मैं न था दोस्तो
बिमल कृष्ण अश्क
जब चौदहवीं का चाँद निकलता दिखाई दे
बिमल कृष्ण अश्क
इतना अच्छा न अगर होता तो हम सा होता
बिमल कृष्ण अश्क
हम से भली चाल चली चाँदनी
बिमल कृष्ण अश्क
चाँद को रेशमी बादल से उलझता देखूँ
बिमल कृष्ण अश्क
क़ासिद तू ख़त को लाया है क्यूँकर खुला हुआ
बिल्क़ीस बेगम