Love Poetry (page 181)

आता है कोई लुत्फ़ का सामाँ लिए हुए

बिल्क़ीस बेगम

ज़रा सी देर भी रुकता तो कुछ पता चलता

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

तमाम लाला ओ गुल के चराग़ रौशन हैं

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

हर-दिल-अज़ीज़ वो भी है हम भी हैं ख़ुश-मिज़ाज

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

नज़र आता है वो जैसा नहीं है

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

काँटे हों या फूल अकेले चुनना होगा

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

कब एक रंग में दुनिया का हाल ठहरा है

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

कब इक मक़ाम पे रुकती है सर-फिरी है हवा

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

जाने क्या कुछ है आज होने को

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

हमारी जागती आँखों में ख़्वाब सा क्या था

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

एक आलम है ये हैरानी का जीना कैसा

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

दीवार-ओ-दर में सिमटा इक लम्स काँपता है

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

देता था जो साया वो शजर काट रहा है

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

अपनी तो कोई बात बनाए नहीं बनी

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

लगा के नक़्ब किसी रोज़ मार सकते हैं

बिल्क़ीस ख़ान

करूँ क्या सख़्त मुश्किल आ पड़ी है

बिल्क़ीस ख़ान

हमारी ख़ाक तबर्रुक समझ के ले जाओ

बिलाल अहमद

अजीब क़ैद थी जिस में बहुत ख़ुशी थी मुझे

बिलाल अहमद

सोते में मुस्कुराते बच्चे को देख कर

बिलाल अहमद

नास्टैल्जिया

बिलाल अहमद

मुश्किल

बिलाल अहमद

दीवार-ए-काबा 19 नवम्बर 1989

बिलाल अहमद

धुँद

बिलाल अहमद

ज़मीं नई थी अनासिर की ख़ू बदलती थी

बिलाल अहमद

तिरी तलाश में निकला तो रास्ता हुआ मैं

बिलाल अहमद

शफ़क़ से बाम-ए-फ़लक लाला-गूँ भी होता है

बिलाल अहमद

रिस रहा है मुद्दत से कोई पहला ग़म मुझ में

बिलाल अहमद

इक दिखावा रह गया बस दिल से वो चाहत गई

बिलाल अहमद

जाम-ए-गदाई हाथ में ले नित सांज-सवेरे फिरते हैं

भूरे ख़ान आशुफ़्ता

सितारे हार चुकी थी सभी जुआरी रात

भवेश दिलशाद