Love Poetry (page 183)
मैं ने सोचा था मुझे मिस्मार कर सकता नहीं
भारत भूषण पन्त
लाख टकराते फिरें हम सर दर-ओ-दीवार से
भारत भूषण पन्त
कुछ न कुछ सिलसिला ही बन जाता
भारत भूषण पन्त
किसी भी सम्त निकलूँ मेरा पीछा रोज़ होता है
भारत भूषण पन्त
ख़्वाहिश-ए-पर्वाज़ है तो बाल-ओ-पर भी चाहिए
भारत भूषण पन्त
ख़्वाब जीने नहीं देंगे तुझे ख़्वाबों से निकल
भारत भूषण पन्त
कभी सुकूँ कभी सब्र-ओ-क़रार टूटेगा
भारत भूषण पन्त
कब तलक चलना है यूँ ही हम-सफ़र से बात कर
भारत भूषण पन्त
कब तक गर्दिश में रहना है कुछ तो बता अय्याम मुझे
भारत भूषण पन्त
इश्क़ का रोग तो विर्से में मिला था मुझ को
भारत भूषण पन्त
हर एक रात में अपना हिसाब कर के मुझे
भारत भूषण पन्त
दीद की तमन्ना में आँख भर के रोए थे
भारत भूषण पन्त
दयार-ए-ज़ात में जब ख़ामुशी महसूस होती है
भारत भूषण पन्त
दानिस्ता जो हो न सके नादानी से हो जाता है
भारत भूषण पन्त
चाहतों के ख़्वाब की ताबीर थी बिल्कुल अलग
भारत भूषण पन्त
अंधेरा मिटता नहीं है मिटाना पड़ता है
भारत भूषण पन्त
आईने से पर्दा कर के देखा जाए
भारत भूषण पन्त
आब की तासीर में हूँ प्यास की शिद्दत में हूँ
भारत भूषण पन्त
आज मक़्तल में ख़बर है कि चराग़ाँ होगा
बेताब सूरी
न मिला तिरा पता तो मुझे लोग क्या कहेंगे
बेताब लखनवी
लड़ गई उन से नज़र खिंच गए अबरू उन के
बेताब अज़ीमाबादी
अक़्ल दौड़ाई बहुत कुछ तो गुमाँ तक पहुँचे
बेताब अज़ीमाबादी
वो कुछ मुस्कुराना वो कुछ झेंप जाना
बेख़ुद देहलवी
सौदा-ए-इश्क़ और है वहशत कुछ और शय
बेख़ुद देहलवी
क़यामत है तिरी उठती जवानी
बेख़ुद देहलवी
नज़र कहीं है मुख़ातब किसी से हैं दिल में
बेख़ुद देहलवी
नौ-गिरफ़्तार-ए-मोहब्बत हूँ वफ़ा मुझ में कहाँ
बेख़ुद देहलवी
न देखना कभी आईना भूल कर देखो
बेख़ुद देहलवी
मोहब्बत और मजनूँ हम तो सौदा इस को कहते हैं
बेख़ुद देहलवी
जादू है या तिलिस्म तुम्हारी ज़बान में
बेख़ुद देहलवी