Love Poetry (page 184)
दिल मोहब्बत से भर गया 'बेख़ुद'
बेख़ुद देहलवी
बात करने की शब-ए-वस्ल इजाज़त दे दो
बेख़ुद देहलवी
अब आप कोई काम सिखा दीजिए हम को
बेख़ुद देहलवी
आइना देख के ख़ुर्शीद पे करते हैं नज़र
बेख़ुद देहलवी
आइना देख कर वो ये समझे
बेख़ुद देहलवी
वो सुन कर हूर की तारीफ़ पर्दे से निकल आए
बेख़ुद देहलवी
वो देखते जाते हैं कनखियों से इधर भी
बेख़ुद देहलवी
वो और तसल्ली मुझे दें उन की बला दे
बेख़ुद देहलवी
उठे तिरी महफ़िल से तो किस काम के उठ्ठे
बेख़ुद देहलवी
टूटे पड़ते हैं ये हैं किस के ख़रीदार तमाम
बेख़ुद देहलवी
तुम्हें हम चाहते तो हैं मगर क्या
बेख़ुद देहलवी
तुम हमारे दिल-ए-शैदा को नहीं जानते क्या
बेख़ुद देहलवी
तेशे से कोई काम न फ़रहाद से हुआ
बेख़ुद देहलवी
शम-ए-मज़ार थी न कोई सोगवार था
बेख़ुद देहलवी
पछताओगे फिर हम से शरारत नहीं अच्छी
बेख़ुद देहलवी
न अरमाँ बन के आते हैं न हसरत बन के आते हैं
बेख़ुद देहलवी
मुँह फेर कर वो कहते हैं बस मान जाइए
बेख़ुद देहलवी
मुझ को न दिल पसंद न वो बेवफ़ा पसंद
बेख़ुद देहलवी
मेरे हम-राह मिरे घर पे भी आफ़त आई
बेख़ुद देहलवी
लुत्फ़ से मतलब न कुछ मेरे सताने से ग़रज़
बेख़ुद देहलवी
लड़ाएँ आँख वो तिरछी नज़र का वार रहने दें
बेख़ुद देहलवी
क्यूँ कह के दिल का हाल उसे बद-गुमाँ करूँ
बेख़ुद देहलवी
क्या मिले आप की महफ़िल में भला एक से एक
बेख़ुद देहलवी
ख़ुदा रक्खे तुझे मेरी बुराई देखने वाले
बेख़ुद देहलवी
कब तक करेंगे जब्र दिल-ए-ना-सुबूर पर
बेख़ुद देहलवी
जो तुझे इम्तिहान देता है
बेख़ुद देहलवी
जो तमाशा नज़र आया उसे देखा समझा
बेख़ुद देहलवी
झूट सच आप तो इल्ज़ाम दिए जाते हैं
बेख़ुद देहलवी
जताए जाते हैं एहसान भी सता के मुझे
बेख़ुद देहलवी
हो के मजबूर आह करता हूँ
बेख़ुद देहलवी