Love Poetry (page 190)
मैं तिरे डर से रो नहीं सकता
बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान
ले के दिल उस शोख़ ने इक दाग़ सीने पर दिया
बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान
कोई किसी का कहीं आश्ना नहीं देखा
बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान
कहा अग़्यार का हक़ में मिरे मंज़ूर मत कीजो
बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान
जादू थी सेहर थी बला थी
बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान
इश्वा है नाज़ है ग़म्ज़ा है अदा है क्या है
बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान
फ़रहाद किस उम्मीद पे लाता है जू-ए-शीर
बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान
दिल अब उस दिल-शिकन के पास कहाँ
बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान
ज़ब्त-ए-ग़म कर भी लिया तो क्या किया
बासित भोपाली
वारफ़्तगी-ए-इश्क़ न जाए तो क्या करें
बासित भोपाली
उन का बर्बाद-ए-करम कहने के क़ाबिल हो गया
बासित भोपाली
शौक़ को बे-अदब किया इश्क़ को हौसला दिया
बासित भोपाली
सब काएनात-ए-हुस्न का हासिल लिए हुए
बासित भोपाली
मोहब्बत की इंतिहा चाहता हूँ
बासित भोपाली
मेरे रोने पर किसी की चश्म गिर्यां हाए हाए
बासित भोपाली
कुछ सिला ही न मिला इश्क़ में जल जाने का
बासित भोपाली
कोई मेयार-ए-मोहब्बत न रहा मेरे बा'द
बासित भोपाली
किसी के नक़्श-ए-क़दम का निशाँ नहीं मिलता
बासित भोपाली
जैसे भी ये दुनिया है जो कुछ भी ज़माना है
बासित भोपाली
इश्क़-ए-सितम-परस्त क्या हुस्न-ए-सितम-शिआ'र क्या
बासित भोपाली
हयात-ओ-मौत का इक सिलसिला है
बासित भोपाली
हर तरफ़ सोज़ का अंदाज़ जुदागाना है
बासित भोपाली
गिला भी तुझ से बहुत है मगर मोहब्बत भी
बासिर सुल्तान काज़मी
क़रार पाते हैं आख़िर हम अपनी अपनी जगह
बासिर सुल्तान काज़मी
कर लिया दिन में काम आठ से पाँच
बासिर सुल्तान काज़मी
जिन दिनों ग़म ज़ियादा होता है
बासिर सुल्तान काज़मी
दूर साया सा है क्या फूलों में
बासिर सुल्तान काज़मी
बादल है और फूल खिले हैं सभी तरफ़
बासिर सुल्तान काज़मी
ज़ौक़-ए-उल्फ़त अब भी है राहत का अरमाँ अब भी है
बशीरुद्दीन अहमद देहलवी
वो अपने मतलब की कह रहे हैं ज़बान पर गो है बात मेरी
बशीरुद्दीन अहमद देहलवी