Love Poetry (page 191)
पूछते हैं वो इश्क़ का मतलब
बशीरुद्दीन अहमद देहलवी
लड़ ही जाए किसी निगार से आँख
बशीरुद्दीन अहमद देहलवी
कौन कहता है नसीम-ए-सहरी आती है
बशीरुद्दीन अहमद देहलवी
जब मिलेंगे कि अब मिलेंगे आप
बशीरुद्दीन अहमद देहलवी
है दुनिया में ज़बाँ मेरी अगर बंद
बशीरुद्दीन अहमद देहलवी
चराग़ उस ने बुझा भी दिया जला भी दिया
बशीरुद्दीन अहमद देहलवी
तेरे नाम का तारा जाने कब दिखाई दे
बशीर सैफ़ी
किसे ख़बर है मैं दिल से कि जाँ से गुज़रूँगा
बशीर सैफ़ी
हब्स के दिनों में भी घर से कब निकलते हैं
बशीर सैफ़ी
इक हुस्न-ए-बे-मिसाल के जो रू-ब-रू हूँ मैं
बशीर सैफ़ी
भूला-बिसरा ख़्वाब हुए हम
बशीर सैफ़ी
सब की मौजूदगी समझता है
बशीर महताब
रुख़ तुम्हारा हो जिधर हम भी उधर हो जाएँगे
बशीर महताब
इक लम्हा भी गुज़ारूँ भला क्यूँ किसी के साथ
बशीर महताब
चले जाना मगर सुन लो मिरे दिल में ये हसरत है
बशीर महताब
आज-कल के शबाब देखे हैं
बशीर महताब
तज़्किरे में तिरे इक नाम को यूँ जोड़ दिया
बशीर फ़ारूक़ी
शहर-ए-फ़स्ल-ए-गुल से चल कर पत्थरों के दरमियाँ
बशीर फ़ारूक़ी
अब के जुनूँ में लज़्ज़त-ए-आज़ार भी नहीं
बशीर फ़ारूक़ी
वो सितम-परवर ब-चश्म अश्क-बार आ ही गया
बशीर फ़ारूक़
वो कभी शाख़-ए-गुल-ए-तर की तरह लगता है
बशीर फ़ारूक़
सबा गुल-ए-रेज़ जाँ-परवर फ़ज़ा है
बशीर फ़ारूक़
ज़िंदगी तू ने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मीं
बशीर बद्र
यारो नए मौसम ने ये एहसान किए हैं
बशीर बद्र
वो इत्र-दान सा लहजा मिरे बुज़ुर्गों का
बशीर बद्र
वो चेहरा किताबी रहा सामने
बशीर बद्र
वो चाँदनी का बदन ख़ुशबुओं का साया है
बशीर बद्र
वो चाँदनी का बदन ख़ुशबुओं का साया है
बशीर बद्र
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
बशीर बद्र
तुम्हारे साथ ये मौसम फ़रिश्तों जैसा था
बशीर बद्र