Love Poetry (page 206)

दमक उठी है फ़ज़ा माहताब-ए-ख़्वाब के साथ

बद्र-ए-आलम ख़लिश

आसमाँ पर काले बादल छा गए

बद्र-ए-आलम ख़लिश

अज़ाब होती हैं अक्सर शबाब की घड़ियाँ

बद्र वास्ती

नवेद-ए-सफ़र

बद्र वास्ती

ख़बर शाकी है

बद्र वास्ती

ज़ेहन और दिल में जो रहती है चुभन खुल जाए

बद्र वास्ती

तुम्हारे दिल में जो ग़म बसा है तो मैं कहाँ हूँ

बद्र वास्ती

फल दरख़्तों से गिरे थे आँधियों में थाल भर

बद्र वास्ती

इक़रार किसी दिन है तो इंकार किसी दिन

बद्र वास्ती

फ़िक्र-ए-अहल-ए-हुनर पे बैठी है

बद्र वास्ती

चराग़ों में अँधेरा है अँधेरे में उजाले हैं

बद्र वास्ती

बुरा हो कर भी वो अच्छा बहुत है

बद्र वास्ती

तब

बद्र मुनीरुद्दीन

आँखें मेरी क्या ढूँडती हैं

बदनाम नज़र

ज़हर पिए मदहोश अँधेरी रात

बदनाम नज़र

टपकते शो'लों की बरसात में नहाउँगा

बदनाम नज़र

हयात ढूँढ रहा हूँ क़ज़ा की राहों में

बदनाम नज़र

गुम-शुदा मौसम का आँखों में कोई सपना सा था

बदनाम नज़र

दीवार-ओ-दर का नाम था कोई मकाँ न था

बदनाम नज़र

दिल-ओ-जाँ के फ़साने क्या हुए सब

बदनाम नज़र

बाग़-ए-दिल में कोई ग़ुंचा न खिला तेरे बा'द

बदनाम नज़र

मुझ को नहीं मालूम कि वो कौन है क्या है

बदीउज़्ज़माँ ख़ावर

महसूस हो रहा है जो ग़म मेरी ज़ात का

बदीउज़्ज़माँ ख़ावर

कब बयाबाँ राह में आया ये समझा ही नहीं

बदीउज़्ज़माँ ख़ावर

जिसे भी देखिए प्यासा दिखाई देता है

बदीउज़्ज़माँ ख़ावर

जले हैं दिल न चराग़ों ने रौशनी की है

बदीउज़्ज़माँ ख़ावर

है बहुत मुश्किल निकलना शहर के बाज़ार में

बदीउज़्ज़माँ ख़ावर

आग ही काश लग गई होती

बदीउज़्ज़माँ ख़ावर

हिज्र में जो अश्क-ए-चश्म-ए-तर गिरा

बदर जमाली

अपने चेहरे पर कई चेहरे लिए

बदर जमाली