Love Poetry (page 254)

जो बुत है यहाँ अपनी जा एक ही है

आरज़ू लखनवी

जितना था सरगर्म-ए-कार उतना ही दिल नाकाम था

आरज़ू लखनवी

जिन रातों में नींद उड़ जाती है क्या क़हर की रातें होती हैं

आरज़ू लखनवी

जहाँ कि है जुर्म एक निगाह करना

आरज़ू लखनवी

हुस्न से शरह हुई इश्क़ के अफ़्साने की

आरज़ू लखनवी

हम आज खाएँगे इक तीर इम्तिहाँ के लिए

आरज़ू लखनवी

हर साँस है इक नग़्मा हर नग़्मा है मस्ताना

आरज़ू लखनवी

हाँ दीद का इक़रार अगर हो तो अभी हो

आरज़ू लखनवी

गोरे गोरे चाँद से मुँह पर काली काली आँखें हैं

आरज़ू लखनवी

गँवा के दिल सा गुहर दर्द-ए-सर ख़रीद लिया

आरज़ू लखनवी

दूर थे होश-ओ-हवास अपने से भी बेगाना था

आरज़ू लखनवी

दिल मुकद्दर है आईना-रू का

आरज़ू लखनवी

दिल में याद-ए-बुत-ए-बे-पीर लिए बैठा हूँ

आरज़ू लखनवी

दिल दे रहा था जो उसे बे-दिल बना दिया

आरज़ू लखनवी

देखें महशर में उन से क्या ठहरे

आरज़ू लखनवी

दम-ब-ख़ुद बैठ के ख़ुद जैसे ज़बाँ गीली है

आरज़ू लखनवी

बग़ौर देख रहा है अदा-शनास मुझे

आरज़ू लखनवी

अयाँ है बे-रुख़ी चितवन से और ग़ुस्सा निगाहों से

आरज़ू लखनवी

अव्वल-ए-शब वो बज़्म की रौनक़ शम्अ' भी थी परवाना भी

आरज़ू लखनवी

ऐ मिरे ज़ख़्म-ए-दिल-नवाज़ ग़म को ख़ुशी बनाए जा

आरज़ू लखनवी

ऐ जज़्ब-ए-मोहब्बत तू ही बता क्यूँकर न असर ले दिल ही तो है

आरज़ू लखनवी

आराम के थे साथी क्या क्या जब वक़्त पड़ा तो कोई नहीं

आरज़ू लखनवी

आँख से दिल में आने वाला

आरज़ू लखनवी

आने में झिझक मिलने में हया तुम और कहीं हम और कहीं

आरज़ू लखनवी

दिल की बाज़ी लगा के देख लिया

अरुण कुमार आर्य

चोट दिल पर लगे और आह ज़बाँ से निकले

अरुण कुमार आर्य

आँख उन से मिरी मिली थी कभी

अरुण कुमार आर्य

हमारी महफ़िलों में बे-हिजाब आने से क्या होगा

अर्शी रामपुरी

उफ़ुक़ के ख़ूनीं धुँदलकों का सुब्ह नाम नहीं

अर्शी भोपाली

तमाम हुस्न-ए-जहाँ का जवाब हो के रहा

अर्शी भोपाली