Love Poetry (page 253)
वो सर-ए-बाम कब नहीं आता
आरज़ू लखनवी
वो क्या लिखता जिसे इंकार करते भी हिजाब आया
आरज़ू लखनवी
वो बन कर बे-ज़बाँ लेने को बैठे हैं ज़बाँ मुझ से
आरज़ू लखनवी
वअ'दा सच्चा है कि झूटा मुझे मालूम न था
आरज़ू लखनवी
उस की तो एक दिल-लगी अपना बना के छोड़ दे
आरज़ू लखनवी
तुम्हें क्या काम नालों से तुम्हें क्या काम आहों से
आरज़ू लखनवी
तस्कीन-ए-दिल का ये क्या क़रीना
आरज़ू लखनवी
तक़दीर पे शाकिर रह कर भी ये कौन कहे तदबीर न कर
आरज़ू लखनवी
तलाश-ए-रंग में आवारा मिस्ल-ए-बू हूँ मैं
आरज़ू लखनवी
रस उन आँखों का है कहने को ज़रा सा पानी
आरज़ू लखनवी
क़ुर्बत बढ़ा बढ़ा कर बे-ख़ुद बना रहे हैं
आरज़ू लखनवी
पियूँ ही क्यूँ जो बुरा जानूँ और छुपा के पियूँ
आरज़ू लखनवी
फेर जो पड़ना था क़िस्मत में वो हस्ब-ए-मामूल पड़ा
आरज़ू लखनवी
नज़र उस चश्म पे है जाम लिए बैठा हूँ
आरज़ू लखनवी
नाले मजबूरों के ख़ाली नहीं जाने वाले
आरज़ू लखनवी
न कोई जल्वती न कोई ख़ल्वती न कोई ख़ास था न कोई आम था
आरज़ू लखनवी
न कर तलाश-ए-असर तीर है लगा न लगा
आरज़ू लखनवी
मुझ को दिल क़िस्मत ने उस को हुस्न-ए-ग़ारत-गर दिया
आरज़ू लखनवी
मीर-ए-महफ़िल न हुए गर्मी-ए-महफ़िल तो हुए
आरज़ू लखनवी
मिरी निगाह कहाँ दीद-ए-हुस्न-ए-यार कहाँ
आरज़ू लखनवी
मिरे जोश-ए-ग़म की है अजब कहानी
आरज़ू लखनवी
मासूम नज़र का भोला-पन ललचा के लुभाना क्या जाने
आरज़ू लखनवी
क्यूँ किसी रह-रौ से पूछूँ अपनी मंज़िल का पता
आरज़ू लखनवी
कुछ दिन की रौनक़ बरसों का जीना
आरज़ू लखनवी
किसी गुमान-ओ-यक़ीं की हद में वो शोख़-ए-पर्दा-नशीं नहीं है
आरज़ू लखनवी
किस मस्त अदा से आँख लड़ी मतवाला बना लहरा के गिरा
आरज़ू लखनवी
ख़ाली बैठे क्यूँ दिन काटें आओ रे जी इक काम करें
आरज़ू लखनवी
करम उन का ख़ुद है बढ़ कर मिरी हद्द-ए-इल्तिजा से
आरज़ू लखनवी
कहीं सर पटकते दीवाने कहीं पर झुलसते परवाने
आरज़ू लखनवी
जो दिल साथ छुटने से घबरा रहा है
आरज़ू लखनवी