Love Poetry (page 293)
बहुत बे-ज़ार होती जा रही हूँ
अम्बरीन सलाहुद्दीन
असीर-ए-ख़्वाब नई जुस्तुजू के दर खोलें
अम्बरीन सलाहुद्दीन
ज़िंदगी-भर एक ही कार-ए-हुनर करते रहे
अंबरीन हसीब अंबर
तुम्हारा जो सहारा हो गया है
अंबरीन हसीब अंबर
सितारा-बार बन जाए नज़र ऐसा नहीं होता
अंबरीन हसीब अंबर
शब थी बे-ख़्वाब इक आरज़ू देर तक
अंबरीन हसीब अंबर
मिला भी ज़ीस्त में क्या रन्ज-ए-रह-गुज़ार से कम
अंबरीन हसीब अंबर
मैं ने सोचा है रात-भर तुम को
अंबरीन हसीब अंबर
ख़ुशी का लम्हा रेत था सो हाथ से निकल गया
अंबरीन हसीब अंबर
कब मौसम-ए-बहार पुकारा नहीं किया
अंबरीन हसीब अंबर
जिस्म-ओ-जाँ में दर आई इस क़दर अज़िय्यत क्यूँ
अंबरीन हसीब अंबर
जब से ज़िंदगी हुआ दिल गर्दिश-ए-तक़दीर का
अंबरीन हसीब अंबर
इक गली से ख़ुश्बू की रस्म-ओ-राह काफ़ी है
अंबरीन हसीब अंबर
दिल जिन को ढूँढता है न-जाने कहाँ गए
अंबरीन हसीब अंबर
ध्यान में आ कर बैठ गए हो तुम भी नाँ
अंबरीन हसीब अंबर
अयाँ दोनों से तक्मील-ए-जहाँ है
अंबरीन हसीब अंबर
अब असीरी की ये तदबीर हुई जाती है
अंबरीन हसीब अंबर
साएबाँ क्या अब्र का टुकड़ा है क्या
अम्बर शमीम
रंग काला है न है पैकर सियाह
अम्बर शमीम
कोई दीवार न दर बाक़ी है
अम्बर शमीम
मुश्किल को समझने का वसीला निकल आता
अम्बर खरबंदा
जहाँ में हर बशर मजबूर हो ऐसा नहीं होता
अम्बर खरबंदा
सूखी टहनी पर हरियल
अम्बर बहराईची
इम्बिसात-ए-अज़ली
अम्बर बहराईची
हम ख़्वाब-ज़दा
अम्बर बहराईची
एक रियाज़त ये भी
अम्बर बहराईची
वो लम्हा मुझ को शश्दर कर गया था
अम्बर बहराईची
शब ख़्वाब के जज़ीरों में हँस कर गुज़र गई
अम्बर बहराईची
मिरे चेहरे पे जो आँसू गिरा था
अम्बर बहराईची
मैं अपनी वुसअतों को उस गली में भूल जाता हूँ
अम्बर बहराईची