Love Poetry (page 294)
क्यूँ न हों शाद कि हम राहगुज़र में हैं अभी
अम्बर बहराईची
जलते हुए जंगल से गुज़रना था हमें भी
अम्बर बहराईची
जगमगाती रौशनी के पार क्या था देखते
अम्बर बहराईची
हर तरफ़ उस के सुनहरे लफ़्ज़ हैं फैले हुए
अम्बर बहराईची
हर लम्हा सैराबी की अर्ज़ानी है
अम्बर बहराईची
हँसते हुए चेहरे में कोई शाम छुपी थी
अम्बर बहराईची
गुलाब था न कँवल फिर बदन वो कैसा था
अम्बर बहराईची
गीली मिट्टी हाथ में ले कर बैठा हूँ
अम्बर बहराईची
गर्दिश का इक लम्हा यूँ बेबाक हुआ
अम्बर बहराईची
चेहरों पे ज़र-पोश अंधेरे फैले हैं
अम्बर बहराईची
बुरीदा बाज़ुओं में वो परिंद लाला-बार था
अम्बर बहराईची
अब क़बीले की रिवायत है बिखरने वाली
अम्बर बहराईची
आज फिर धूप की शिद्दत ने बड़ा काम किया
अम्बर बहराईची
फिर कोई मुश्किल जवाँ होने को है
अमर सिंह फ़िगार
मजबूरियों में बाँट ले जो दर्द कौन है
अमर सिंह फ़िगार
किसे ख़याल कि इशरत के बाब कितने हैं
अमर सिंह फ़िगार
कल एक शख़्स जो अच्छे-भले लिबास में था
अमर सिंह फ़िगार
जब कोई रास्ता नहीं होता
अमर सिंह फ़िगार
बैठा है सोगवार सितमगर के शहर में
अमर सिंह फ़िगार
बोसा आँखों का जो माँगा तो वो हँस कर बोले
अमानत लखनवी
उलझा दिल-ए-सितम-ज़दा ज़ुल्फ़-ए-बुताँ से आज
अमानत लखनवी
सुब्ह-ए-विसाल-ए-ज़ीस्त का नक़्शा बदल गया
अमानत लखनवी
रूह को राह-ए-अदम में मिरा तन याद आया
अमानत लखनवी
रवाँ दवाँ नहीं याँ अश्क चश्म-ए-तर की तरह
अमानत लखनवी
लुत्फ़ अब ज़ीस्त का ऐ गर्दिश-ए-अय्याम नहीं
अमानत लखनवी
ख़ाना-ए-ज़ंजीर का पाबंद रहता हूँ सदा
अमानत लखनवी
हैं जल्वा-ए-तन से दर-ओ-दीवार बसंती
अमानत लखनवी
भूला हूँ मैं आलम को सरशार इसे कहते हैं
अमानत लखनवी
आग़ोश में जो जल्वागर इक नाज़नीं हुआ
अमानत लखनवी
सबा की बात सुनें फूल से कलाम करें
अल्ताफ़ परवाज़