Love Poetry (page 317)
मिरी आँखों से ज़ाहिर ख़ूँ-फ़िशानी अब भी होती है
अख़्तर शीरानी
मैं आरज़ू-ए-जाँ लिखूँ या जान-ए-आरज़ू!
अख़्तर शीरानी
ला पिला साक़ी शराब-ए-अर्ग़वानी फिर कहाँ
अख़्तर शीरानी
कुछ तो तन्हाई की रातों में सहारा होता
अख़्तर शीरानी
किस को देखा है ये हुआ क्या है
अख़्तर शीरानी
किस की आँखों का लिए दिल पे असर जाते हैं
अख़्तर शीरानी
ख़यालिस्तान-ए-हस्ती में अगर ग़म है ख़ुशी भी है
अख़्तर शीरानी
काम आ सकीं न अपनी वफ़ाएँ तो क्या करें
अख़्तर शीरानी
झूम कर बदली उठी और छा गई
अख़्तर शीरानी
हर एक जल्वा-ए-रंगीं मिरी निगाह में है
अख़्तर शीरानी
हमारे हाथ में कब साग़र-ए-शराब नहीं
अख़्तर शीरानी
दिल-ए-दीवाना ओ अंदाज़-ए-बेबाकाना रखते हैं
अख़्तर शीरानी
दिल में ख़याल-ए-नर्गिस-ए-जानाना आ गया
अख़्तर शीरानी
बजा कि है पास-ए-हश्र हम को करेंगे पास-ए-शबाब पहले
अख़्तर शीरानी
अश्क-बारी न मिटी सीना-फ़िगारी न गई
अख़्तर शीरानी
ऐ दिल वो आशिक़ी के फ़साने किधर गए
अख़्तर शीरानी
अगर वो अपने हसीन चेहरे को भूल कर बे-नक़ाब कर दे
अख़्तर शीरानी
आश्ना हो कर तग़ाफ़ुल आश्ना क्यूँ हो गए
अख़्तर शीरानी
आरज़ू वस्ल की रखती है परेशाँ क्या क्या
अख़्तर शीरानी
आओ बे-पर्दा तुम्हें जल्वा-ए-पिन्हाँ की क़सम
अख़्तर शीरानी
लफ़्ज़ लिखना है तो फिर काग़ज़ की निय्यत से न डर
अख़्तर शेख़
वक़्त बे-रहम है मक़्तल की ज़मीनों जैसा
अख़तर शाहजहाँपुरी
समुंदर सब के सब पायाब से हैं
अख़तर शाहजहाँपुरी
लम्हा लम्हा यही सोचूँ यही देखा चाहूँ
अख़तर शाहजहाँपुरी
कहाँ से लाएँगे आँसू अज़ा-दारी के मौसम में
अख़तर शाहजहाँपुरी
जो क़तरे में समुंदर देखते हैं
अख़तर शाहजहाँपुरी
जो फ़क़त शोख़ी-ए-तहरीर भी हो सकती है
अख़तर शाहजहाँपुरी
जब मुख़ालिफ़ मिरा राज़-दाँ हो गया
अख़तर शाहजहाँपुरी
हाथ जब मौसम के गीले हो गए हैं
अख़तर शाहजहाँपुरी
इक उम्र भटकते रहे घर ही नहीं आया
अख़तर शाहजहाँपुरी