Love Poetry (page 315)
ज़रा सी देर थी बस इक दिया जलाना था
अख्तर शुमार
या तो सूरज झूट है या फिर ये साया झूट है
अख्तर शुमार
वो जिस का अक्स लहू को जगा दिया करता
अख्तर शुमार
उस की चाह में नाम नहीं आने वाला
अख्तर शुमार
उस के नज़दीक ग़म-ए-तर्क-ए-वफ़ा कुछ भी नहीं
अख्तर शुमार
सारी ख़िल्क़त एक तरफ़ थी और दिवाना एक तरफ़
अख्तर शुमार
पड़े थे हम भी जहाँ रौशनी में बिखरे हुए
अख्तर शुमार
लरज़ उठा है मिरे दिल में क्यूँ न जाने दिया
अख्तर शुमार
ख़्वाहिश-ए-जादा-ए-राहत से निकलता कैसे
अख्तर शुमार
ऐ दुनिया तेरे रस्ते से हट जाएँगे
अख्तर शुमार
अभी दिल में गूँजती आहटें मिरे साथ हैं
अख्तर शुमार
ज़िंदगी कितनी मसर्रत से गुज़रती या रब
अख़्तर शीरानी
याद आओ मुझे लिल्लाह न तुम याद करो
अख़्तर शीरानी
उस के अहद-ए-शबाब में जीना
अख़्तर शीरानी
तमन्नाओं को ज़िंदा आरज़ूओं को जवाँ कर लूँ
अख़्तर शीरानी
मुबारक मुबारक नया साल आया
अख़्तर शीरानी
मोहब्बत के इक़रार से शर्म कब तक
अख़्तर शीरानी
मिट चले मेरी उमीदों की तरह हर्फ़ मगर
अख़्तर शीरानी
लॉन्ड्री खोली थी उस के इश्क़ में
अख़्तर शीरानी
कूचा-ए-हुस्न छुटा तो हुए रुस्वा-ए-शराब
अख़्तर शीरानी
इश्क़ को नग़्मा-ए-उम्मीद सुना दे आ कर
अख़्तर शीरानी
इन्ही ग़म की घटाओं से ख़ुशी का चाँद निकलेगा
अख़्तर शीरानी
है क़यामत तिरे शबाब का रंग
अख़्तर शीरानी
ग़म अज़ीज़ों का हसीनों की जुदाई देखी
अख़्तर शीरानी
दिन रात मय-कदे में गुज़रती थी ज़िंदगी
अख़्तर शीरानी
बजा कि है पास-ए-हश्र हम को करेंगे पास-ए-शबाब पहले
अख़्तर शीरानी
अब तो मिलिए बस लड़ाई हो चुकी
अख़्तर शीरानी
वक़्त की क़द्र
अख़्तर शीरानी
ओ देस से आने वाले बता
अख़्तर शीरानी
नज़्र-ए-वतन
अख़्तर शीरानी