Love Poetry (page 363)
वक़्त के तूफ़ानी सागर में क्रोध कपट के रेले हैं
अफ़ज़ल परवेज़
लैला सर-ब-गरेबाँ है मजनूँ सा आशिक़-ए-ज़ार कहाँ
अफ़ज़ल परवेज़
ख़ुश-क़िस्मत हैं वो जो गाँव में लम्बी तान के सोते हैं
अफ़ज़ल परवेज़
कारज़ार-ए-इश्क़-ओ-सर-मस्ती में नुसरत-याब हों
अफ़ज़ल परवेज़
जो दर्द-ए-दिल कहो आहिस्ता बोलो
अफ़ज़ल परवेज़
हुस्न हीरे की कनी हो जैसे
अफ़ज़ल परवेज़
गर्द उड़े या कोई आँधी ही चले
अफ़ज़ल परवेज़
सुबू उठाऊँ तो पीने के बीच खुलती है
अफ़ज़ाल नवेद
न रोना रह गया बाक़ी न हँसना रह गया बाक़ी
अफ़ज़ाल नवेद
मकान-ए-ख़्वाब में जंगल की बास रहने लगी
अफ़ज़ाल नवेद
जंग से जंगल बना जंगल से मैं निकला नहीं
अफ़ज़ाल नवेद
इक धन को एक धन से अलग कर लूँ और गाऊँ
अफ़ज़ाल नवेद
दिखाई दे कि शुआ-ए-बसीर खींचता हूँ
अफ़ज़ाल नवेद
धनक में सर थे तिरी शाल के चुराए हुए
अफ़ज़ाल नवेद
बाग़ क्या क्या शजर दिखाते हैं
अफ़ज़ाल नवेद
आँचल में नज़र आती हैं कुछ और सी आँखें
अफ़ज़ाल नवेद
ज़िंदगी इतनी परेशाँ है ये सोचा भी न था
अफ़ज़ल मिनहास
ये भी शायद ज़िंदगी की इक अदा है दोस्तो
अफ़ज़ल मिनहास
चाँद में कैसे नज़र आए तिरी सूरत मुझे
अफ़ज़ल मिनहास
उस पेड़ को छुआ तो समर-दार हो गया
अफ़ज़ल मिनहास
मिटते हुए नुक़ूश-ए-वफ़ा को उभारिए
अफ़ज़ल मिनहास
मैं फ़क़त इस जुर्म में दुनिया में रुस्वा हो गया
अफ़ज़ल मिनहास
मैं अपने दिल में नई ख़्वाहिशें सजाए हुए
अफ़ज़ल मिनहास
लोग हँसने के लिए रोते हैं अक्सर दहर में
अफ़ज़ल मिनहास
कर्ब के शहर से निकले तो ये मंज़र देखा
अफ़ज़ल मिनहास
काँच की ज़ंजीर टूटी तो सदा भी आएगी
अफ़ज़ल मिनहास
जो शख़्स भी मिला है वो इक ज़िंदा लाश है
अफ़ज़ल मिनहास
हर चंद ज़िंदगी का सफ़र मुश्किलों में है
अफ़ज़ल मिनहास
गिर पड़ा तू आख़िरी ज़ीने को छू कर किस लिए
अफ़ज़ल मिनहास
गहरा सुकूत ज़ेहन को बेहाल कर गया
अफ़ज़ल मिनहास