Love Poetry (page 62)
वो मुझे सोज़-ए-तमन्ना की तपिश समझा गया
हनीफ़ अख़गर
तुम ख़ुद ही मोहब्बत की हर इक बात भुला दो
हनीफ़ अख़गर
तोड़ कर जोड़ दिया करते हो क्या करते हो
हनीफ़ अख़गर
शिकस्ता दिल किसी का हो हम अपना दिल समझते हैं
हनीफ़ अख़गर
साज़ में सोज़ जब नहीं आता
हनीफ़ अख़गर
संग बरसेंगे और मुस्कुराएँगे हम
हनीफ़ अख़गर
नफ़स नफ़स ने उड़ाईं हवाइयाँ क्या क्या
हनीफ़ अख़गर
ख़ल्वत-ए-जाँ में तिरा दर्द बसाना चाहे
हनीफ़ अख़गर
जल्वों का जो तेरे कोई प्यासा नज़र आया
हनीफ़ अख़गर
इतना सुकून तो ग़म-ए-पिन्हाँ में आ गया
हनीफ़ अख़गर
इश्क़ में दिल का ये मंज़र देखा
हनीफ़ अख़गर
इश्क़ जब मंज़िल-ए-आख़िर से गुज़रता होगा
हनीफ़ अख़गर
इस तरह अहद-ए-तमन्ना को गुज़ारे जाइए
हनीफ़ अख़गर
हाल-ए-दिल-ए-बीमार समझ में चारागरों की आए कम
हनीफ़ अख़गर
दिल की मिरे बिसात क्या एक दिया बुझा हुआ
हनीफ़ अख़गर
देखना ये इश्क़ में हुस्न-ए-पज़ीराई के रंग
हनीफ़ अख़गर
अज़्म-ए-सफ़र से पहले भी और ख़त्म-ए-सफ़र से आगे भी
हनीफ़ अख़गर
सुब्ह सवेरे नंगे पाँव घास पे चलना ऐसा है
हम्माद नियाज़ी
कच्ची क़ब्रों पर सजी ख़ुशबू की बिखरी लाश पर
हम्माद नियाज़ी
दिखाई देने लगी थी ख़ुशबू
हम्माद नियाज़ी
यक़ीन की सल्तनत थी और सुल्तानी हमारी
हम्माद नियाज़ी
उम्र की अव्वलीं अज़ानों में
हम्माद नियाज़ी
सब्ज़-खेतों से उमड़ती रौशनी तस्वीर की
हम्माद नियाज़ी
जिस की सौंधी सौंधी ख़ुशबू आँगन आँगन पलती थी
हम्माद नियाज़ी
जब मुंडेरों पे परिंदों की कुमक जारी थी
हम्माद नियाज़ी
हुज्रा-ए-ख़्वाब से बाहर निकला
हम्माद नियाज़ी
हमारे बस में क्या है और हमारे बस में क्या नहीं
हम्माद नियाज़ी
गली का मंज़र बदल रहा था
हम्माद नियाज़ी
दिल के सूने सहन में गूँजी आहट किस के पाँव की
हम्माद नियाज़ी
भुला दिया भी अगर जाए सरसरी किया जाए
हम्माद नियाज़ी