Love Poetry (page 67)

सारे मामूलात में इक ताज़ा गर्दिश चाहिए

हकीम मंज़ूर

सारे चेहरे ताँबे के हैं लेकिन सब पर क़लई है

हकीम मंज़ूर

फूल हो कर फूल को क्या चाहना

हकीम मंज़ूर

मुंतशिर सायों का है या अक्स-ए-बे-पैकर का है

हकीम मंज़ूर

मिरे वजूद की दुनिया में है असर किस का

हकीम मंज़ूर

कुछ समझ आया न आया मैं ने सोचा है उसे

हकीम मंज़ूर

कोई पयाम अब न पयम्बर ही आएगा

हकीम मंज़ूर

ख़ुशबुओं की दश्त से हमसायगी तड़पाएगी

हकीम मंज़ूर

ख़ुद अपने-आप से मिलने का मैं अपना इरादा हूँ

हकीम मंज़ूर

हर एक आँख को कुछ टूटे ख़्वाब दे के गया

हकीम मंज़ूर

है इज़्तिराब हर इक रंग को बिखरने का

हकीम मंज़ूर

ढल गया जिस्म में आईने में पत्थर में कभी

हकीम मंज़ूर

छोड़ कर बार-ए-सदा वो बे-सदा हो जाएगा

हकीम मंज़ूर

भेजता हूँ हर रोज़ मैं जिस को ख़्वाब कोई अन-देखा सा

हकीम मंज़ूर

बयाबाँ-ज़ाद कोई क्या कहे ख़ुद बे-मकाँ है

हकीम मंज़ूर

अज़िय्यतों को किसी तरह कम न कर पाया

हकीम मंज़ूर

अपनी नज़र से टूट कर अपनी नज़र में गुम हुआ

हकीम मंज़ूर

अजब सहरा बदन पर आब का इबहाम रक्खा है

हकीम मंज़ूर

आगे पीछे उस का अपना साया लहराता रहा

हकीम मंज़ूर

आग जो बाहर है पहुँचेगी अंदर भी

हकीम मंज़ूर

तेरी निगाह-ए-नाज़ जो नावक-असर न हो

हकीम असद अली ख़ान मुज़्तर

मक़्सद-ए-हयात

हाजी लक़ लक़

बहिश्त-ए-बरीँ

हाजी लक़ लक़

आमदनी और ख़र्च

हाजी लक़ लक़

इक तो ख़ुद अपनी ग़मगीनी

हैरत शिमलवी

एक तो ख़ुद अपनी ग़मगीनी

हैरत शिमलवी

हुस्न है काफ़िर बनाने के लिए

हैरत गोंडवी

हँस हँस के अपना दामन-ए-रंगीं दिया मुझे

हैरत गोंडवी

तुझे बातों में लाना चाहता हूँ

हैरत गोंडवी

मोहब्बत में इंकार कितना हसीं है

हैरत गोंडवी