Love Poetry (page 77)
मिटने वाली हसरतें ईजाद कर लेता हूँ मैं
हफ़ीज़ जालंधरी
मिल जाए मय तो सज्दा-ए-शुकराना चाहिए
हफ़ीज़ जालंधरी
मज़हका आओ उड़ाएँ इश्क़-ए-बे-बुनियाद का
हफ़ीज़ जालंधरी
मौत के चेहरे पे है क्यूँ मुर्दनी छाई हुई
हफ़ीज़ जालंधरी
मस्तों पे उँगलियाँ न उठाओ बहार में
हफ़ीज़ जालंधरी
मजाज़ ऐन-ए-हक़ीक़त है बा-सफ़ा के लिए
हफ़ीज़ जालंधरी
क्यूँ हिज्र के शिकवे करता है क्यूँ दर्द के रोने रोता है
हफ़ीज़ जालंधरी
कोई दवा न दे सके मशवरा-ए-दुआ दिया
हफ़ीज़ जालंधरी
कोई चारा नहीं दुआ के सिवा
हफ़ीज़ जालंधरी
किसी के रू-ब-रू बैठा रहा मैं बे-ज़बाँ हो कर
हफ़ीज़ जालंधरी
ख़ून बन कर मुनासिब नहीं दिल बहे
हफ़ीज़ जालंधरी
कम-बख़्त दिल बुरा हुआ तिरी आह आह का
हफ़ीज़ जालंधरी
कल ज़रूर आओगे लेकिन आज क्या करूँ
हफ़ीज़ जालंधरी
कभी ज़मीं पे कभी आसमाँ पे छाए जा
हफ़ीज़ जालंधरी
जवानी के तराने गा रहा हूँ
हफ़ीज़ जालंधरी
जल्वा-ए-हुस्न को महरूम-ए-तमाशाई कर
हफ़ीज़ जालंधरी
जहाँ क़तरे को तरसाया गया हूँ
हफ़ीज़ जालंधरी
इश्क़ ने हुस्न की बे-दाद पे रोना चाहा
हफ़ीज़ जालंधरी
इश्क़ ने अक़्ल को दीवाना बना रक्खा है
हफ़ीज़ जालंधरी
इश्क़ में छेड़ हुई दीदा-ए-तर से पहले
हफ़ीज़ जालंधरी
इश्क़ के हाथों ये सारी आलम-आराई हुई
हफ़ीज़ जालंधरी
हुस्न ने सीखीं ग़रीब-आज़ारियाँ
हफ़ीज़ जालंधरी
हम ही में थी न कोई बात याद न तुम को आ सके
हफ़ीज़ जालंधरी
हैरान न हो देख मैं क्या देख रहा हूँ
हफ़ीज़ जालंधरी
है अज़ल की इस ग़लत बख़्शी पे हैरानी मुझे
हफ़ीज़ जालंधरी
दूर से आँखें दिखाती है नई दुनिया मुझे
हफ़ीज़ जालंधरी
दोस्ती का चलन रहा ही नहीं
हफ़ीज़ जालंधरी
दिल-ए-बे-मुद्दआ है और मैं हूँ
हफ़ीज़ जालंधरी
दिल को वीराना कहोगे मुझे मालूम न था
हफ़ीज़ जालंधरी
दिल अभी तक जवान है प्यारे
हफ़ीज़ जालंधरी