Love Poetry (page 79)
ऐसी भी क्या जल्दी प्यारे जाने मिलें फिर या न मिलें हम
हफ़ीज़ होशियारपुरी
अब कोई आरज़ू नहीं शौक़-ए-पयाम के सिवा
हफ़ीज़ होशियारपुरी
आज उन्हें कुछ इस तरह जी खोल कर देखा किए
हफ़ीज़ होशियारपुरी
ये किस मक़ाम पे लाई है ज़िंदगी हम को
हफ़ीज़ बनारसी
वफ़ा नज़र नहीं आती कहीं ज़माने में
हफ़ीज़ बनारसी
उस से बढ़ कर किया मिलेगा और इनआम-ए-जुनूँ
हफ़ीज़ बनारसी
तदबीर के दस्त-ए-रंगीं से तक़दीर दरख़्शाँ होती है
हफ़ीज़ बनारसी
मैं ने आबाद किए कितने ही वीराने 'हफ़ीज़'
हफ़ीज़ बनारसी
किस मुँह से करें उन के तग़ाफ़ुल की शिकायत
हफ़ीज़ बनारसी
कभी ख़िरद कभी दीवानगी ने लूट लिया
हफ़ीज़ बनारसी
इश्क़ में मारका-ए-क़ल्ब-ओ-नज़र क्या कहिए
हफ़ीज़ बनारसी
हर हक़ीक़त है एक हुस्न 'हफ़ीज़'
हफ़ीज़ बनारसी
एक सीता की रिफ़ाक़त है तो सब कुछ पास है
हफ़ीज़ बनारसी
इक हुस्न-ए-तसव्वुर है जो ज़ीस्त का साथी है
हफ़ीज़ बनारसी
पैग़ाम ईद
हफ़ीज़ बनारसी
ये और बात कि लहजा उदास रखते हैं
हफ़ीज़ बनारसी
वो तो बैठे रहे सर झुकाए हुए
हफ़ीज़ बनारसी
तेज़ जब ख़ंजर-ए-बेदाद किया जाएगा
हफ़ीज़ बनारसी
रात का नाम सवेरा ही सही
हफ़ीज़ बनारसी
क़दम शबाब में अक्सर बहकने लगता है
हफ़ीज़ बनारसी
मुद्दत की तिश्नगी का इनआ'म चाहता हूँ
हफ़ीज़ बनारसी
लहू की मय बनाई दिल का पैमाना बना डाला
हफ़ीज़ बनारसी
लब-ए-फ़ुरात वही तिश्नगी का मंज़र है
हफ़ीज़ बनारसी
क्या जुर्म हमारा है बता क्यूँ नहीं देते
हफ़ीज़ बनारसी
कुछ सोच के परवाना महफ़िल में जला होगा
हफ़ीज़ बनारसी
कोई बतलाए कि ये तुर्फ़ा तमाशा क्यूँ है
हफ़ीज़ बनारसी
ख़फ़ा है गर ये ख़ुदाई तो फ़िक्र ही क्या है
हफ़ीज़ बनारसी
जो नज़र से बयान होती है
हफ़ीज़ बनारसी
जो ख़त है शिकस्ता है जो अक्स है टूटा है
हफ़ीज़ बनारसी
जब तसव्वुर में कोई माह-जबीं होता है
हफ़ीज़ बनारसी