Love Poetry (page 92)
गिला क्या करूँ ऐ फ़लक बता मिरे हक़ में जब ये जहाँ नहीं
गोर बचन सिंह दयाल मग़मूम
बहुत वाक़िफ़ हैं लब-ए-आह-ओ-फ़ुग़ाँ से
गोर बचन सिंह दयाल मग़मूम
अब के सावन में शरारत ये मिरे साथ हुई
गोपालदास नीरज
जब चले जाएँगे हम लौट के सावन की तरह
गोपालदास नीरज
है बहुत अँधियार अब सूरज निकलना चाहिए
गोपालदास नीरज
बदन पे जिस के शराफ़त का पैरहन देखा
गोपालदास नीरज
अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए
गोपालदास नीरज
मुझे ज़िंदगी की दुआ देने वाले
गोपाल मित्तल
तुलू-ए-शब
गोपाल मित्तल
शब-ताब
गोपाल मित्तल
नज़्म
गोपाल मित्तल
नज़्म
गोपाल मित्तल
कि दर गुफ़्तन नमी आयद
गोपाल मित्तल
एक हुस्न-फ़रोश लड़की के नाम
गोपाल मित्तल
ज़बान रक़्स में है और झूमता हूँ मैं
गोपाल मित्तल
उस ने माइल-ब-करम हो के बुलाया है मुझे
गोपाल मित्तल
तेरी आँखों में जो नशा है पज़ीराई का
गोपाल मित्तल
तेरा ख़ुलूस-ए-दिल तो महल्ल-ए-नज़र नहीं
गोपाल मित्तल
स्वाँग अब तर्क-ए-मोहब्बत का रचाया जाए
गोपाल मित्तल
शे'र कहने का मज़ा है अब तो
गोपाल मित्तल
रंगीनी-ए-हवस का वफ़ा नाम रख दिया
गोपाल मित्तल
फिर वो नज़र है इज़्न-ए-तमाशा लिए हुए
गोपाल मित्तल
मुझ पे तू मेहरबान है प्यारे
गोपाल मित्तल
मसरफ़ के बग़ैर जल रहा हूँ
गोपाल मित्तल
किस को है हुस्न-ए-ख़ुदा-दाद का दावा देखें
गोपाल मित्तल
कज-कुलाही की अदा याद आई
गोपाल मित्तल
इश्क़ में कब ये ज़रूरी है कि रोया जाए
गोपाल मित्तल
इश्क़ फ़ानी न हुस्न फ़ानी है
गोपाल मित्तल
फ़क़त इक शग़्ल बेकारी है अब बादा-कशी अपनी
गोपाल मित्तल
दिल जलाने से कहाँ दूर अंधेरा होगा
गोपाल मित्तल