Love Poetry (page 94)
ये भी इक रंग है शायद मिरी महरूमी का
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
वो लोग मुतमइन हैं कि पत्थर हैं उन के पास
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
प्यार गया तो कैसे मिलते रंग से रंग और ख़्वाब से ख़्वाब
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
मोहब्बत की गवाही अपने होने की ख़बर ले जा
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
ख़ुशबू गिरफ़्त-ए-अक्स में लाया और उस के बाद
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
करूँगा क्या जो मोहब्बत में हो गया नाकाम
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
हिज्र के तपते मौसम में भी दिल उन से वाबस्ता है
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
हर साल बहार से पहले मैं पानी पर फूल बनाता हूँ
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
हर बच्चा आँखें खोलते ही करता है सवाल मोहब्बत का
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
गुलाबों के नशेमन से मिरे महबूब के सर तक
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
ज़िंदगी
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
ऊँचे दर्जे का सैलाब
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
तज़ाद
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
समीता-पाटिल
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
कहफ़-उल-क़हत
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
एक ज़ाती नज़्म
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
दुआ और बद-दुआ के दरमियाँ
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
''अटलांटिक सिटी''
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
ज़ेहन में दाएरे से बनाता रहा दूर ही दूर से मुस्कुराता रहा
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
यूँ तो सदा-ए-ज़ख़्म बड़ी दूर तक गई
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
ये जहाँ-नवर्द की दास्ताँ ये फ़साना डोलते साए का
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
सोए हुए जज़्बों को जगाना ही नहीं था
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
सीना मदफ़न बन जाता है जीते जागते राज़ों का
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
शौक़ बरहना-पा चलता था और रस्ते पथरीले थे
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
सब रंग ना-तमाम हों हल्का लिबास हो
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
रात का हर इक मंज़र रंजिशों से बोझल था
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
फिर वही कहने लगे तू मिरे घर आया था
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
फिर तो इस बे-नाम सफ़र में कुछ भी न अपने पास रहा
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
पहले इक शख़्स मेरी ज़ात बना
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
नज़र नज़र में अदा-ए-जमाल रखते थे
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर