Love Poetry (page 95)
मोहब्बत की गवाही अपने होने की ख़बर ले जा
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
मिलने की हर आस के पीछे अन-देखी मजबूरी थी
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
लब पे सुर्ख़ी की जगह जो मुस्कुराहट मल रहे हैं
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
कुछ बे-तरतीब सितारों को पलकों ने किया तस्ख़ीर तो क्या
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
किताब-ए-आरज़ू के गुम-शुदा कुछ बाब रक्खे हैं
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
ख़ामोश थे तुम और बोलता था बस एक सितारा आँखों में
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
कहीं लोग तन्हा कहीं घर अकेले
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
जज़्बों को किया ज़ंजीर तो क्या तारों को किया तस्ख़ीर तो क्या
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
हम ने तो बे-शुमार बहाने बनाए हैं
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
हिज्र के तपते मौसम में भी दिल उन से वाबस्ता है
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
गुलाबों के नशेमन से मिरे महबूब के सर तक
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
बारूद के बदले हाथों में आ जाए किताब तो अच्छा हो
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
बन से फ़सील-ए-शहर तक कोई सवार भी नहीं
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
बन में वीराँ थी नज़र शहर में दिल रोता है
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
बग़ैर उस के अब आराम भी नहीं आता
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
अपने अशआर को रुस्वा सर-ए-बाज़ार करूँ
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
अक्स की सूरत दिखा कर आप का सानी मुझे
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
अकेला दिन है कोई और न तन्हा रात होती है
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
आँख से बिछड़े काजल को तहरीर बनाने वाले
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
ज़ुलेख़ा बे-ख़िरद आवारा लैला बद-मज़ा शीरीं
ग़ुलाम मौला क़लक़
वो संग-दिल अंगुश्त-ब-दंदाँ नज़र आवे
ग़ुलाम मौला क़लक़
तुझ से ऐ ज़िंदगी घबरा ही चले थे हम तो
ग़ुलाम मौला क़लक़
तेरा दीवाना तो वहशत की भी हद से निकला
ग़ुलाम मौला क़लक़
मोहब्बत वो है जिस में कुछ किसी से हो नहीं सकता
ग़ुलाम मौला क़लक़
कौन जाने था उस का नाम-ओ-नुमूद
ग़ुलाम मौला क़लक़
हो मोहब्बत की ख़बर कुछ तो ख़बर फिर क्यूँ हो
ग़ुलाम मौला क़लक़
बुत-ख़ाने की उल्फ़त है न काबे की मोहब्बत
ग़ुलाम मौला क़लक़
बोसा देने की चीज़ है आख़िर
ग़ुलाम मौला क़लक़
अंदाज़ा आदमी का कहाँ गर न हो शराब
ग़ुलाम मौला क़लक़
ज़िंदगी मर्ग की मोहलत ही सही
ग़ुलाम मौला क़लक़