Love Poetry (page 93)

दौर-ए-फ़लक के शिकवे गिले रोज़गार के

गोपाल मित्तल

अपने अंजाम से डरता हूँ मैं

गोपाल मित्तल

अगरचे बे-हिसी-ए-दिल मुझे गवारा नहीं

गोपाल मित्तल

यास की बदली यूँ दिल पर छा गई

गोपाल कृष्णा शफ़क़

रोज़ रौशन रहें हालात ज़रूरी तो नहीं

गोपाल कृष्णा शफ़क़

रह गई लुट कर बहार-ए-ज़िंदगी

गोपाल कृष्णा शफ़क़

मोहब्बत का जिसे सौदा हुआ है

गोपाल कृष्णा शफ़क़

हर घड़ी बीमार हो कर रह गई

गोपाल कृष्णा शफ़क़

बात अपनों की करूँ मैं किसी बेगाने से

गोपाल कृष्णा शफ़क़

आते ही जवानी के ली हुस्न ने अंगड़ाई

गोपाल कृष्णा शफ़क़

मुझे उस नींद के माथे का बोसा हो इनायत

ग़ज़ाला शाहिद

दिए से लौ नहीं पिंदार ले कर जा रही है

ग़ज़ाला शाहिद

मिरे पर न बाँधो

ग़ज़ाला ख़ाकवानी

कोई इक ज़ाइक़ा नहीं मिलता

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

हुस्न-ए-अमल में बरकतें होती हैं बे-शुमार

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

अब और देर न कर हश्र बरपा करने में

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

उबल पड़ा यक-ब-यक समुंदर तो मैं ने देखा

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

ताबीरों से बंद क़बा-ए-ख़्वाब खुले

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

रखता नहीं है दश्त सरोकार आब से

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

क़दमों से मेरे गर्द-ए-सफ़र कौन ले गया

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

मिली राह वो कि फ़रार का न पता चला

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

मौजूदगी का उस की असर होने लगा है

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

हैं और कई रेत के तूफ़ाँ मिरे आगे

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

फ़राख़-दस्त का ये हुस्न-ए-तंग-दस्ती है

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

बढ़ा जब उस की तवज्जोह का सिलसिला कुछ और

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

बात बढ़ती गई आगे मिरी नादानी से

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

आगे आगे शर फैलाता जाता हूँ

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

मुझ को ग़रीब और क़रज़-दार देख कर

ग़ुलाम मोहम्मद वामिक़

कितनी ढल गई उम्र तुम्हारी हैरत है

ग़ुलाम मोहम्मद वामिक़

वक़्त से हम गिला नहीं करते

ग़ुला मोहम्मद सफ़ीर