Love Poetry (page 97)
आप के महरम असरार थे अग़्यार कि हम
ग़ुलाम मौला क़लक़
आए क्या तेरा तसव्वुर ध्यान में
ग़ुलाम मौला क़लक़
ये सच है मिल बैठने की हद तक तो काम आई है ख़ुश-गुमानी
ग़ुलाम हुसैन साजिद
रास आती ही नहीं जब प्यार की शिद्दत मुझे
ग़ुलाम हुसैन साजिद
मैं रिज़्क़-ए-ख़्वाब हो के भी उसी ख़याल में रहा
ग़ुलाम हुसैन साजिद
कभी मोहब्बत से बाज़ रहने का ध्यान आए तो सोचता हूँ
ग़ुलाम हुसैन साजिद
इश्क़ पर इख़्तियार है किस का
ग़ुलाम हुसैन साजिद
इश्क़ पर फ़ाएज़ हूँ औरों की तरह लेकिन मुझे
ग़ुलाम हुसैन साजिद
इश्क़ की दस्तरस में कुछ भी नहीं
ग़ुलाम हुसैन साजिद
हिकायत-ए-इश्क़ से भी दिल का इलाज मुमकिन नहीं कि अब भी
ग़ुलाम हुसैन साजिद
एक ख़्वाहिश है जो शायद उम्र भर पूरी न हो
ग़ुलाम हुसैन साजिद
ढूँड लाया हूँ ख़ुशी की छाँव जिस के वास्ते
ग़ुलाम हुसैन साजिद
उफ़ुक़ से आग उतर आई है मिरे घर भी
ग़ुलाम हुसैन साजिद
सुब्ह तक जिन से बहुत बेज़ार हो जाता हूँ मैं
ग़ुलाम हुसैन साजिद
समझते हैं जो अपने बाप की जागीर मिट्टी को
ग़ुलाम हुसैन साजिद
रुका हूँ किस के वहम में मिरे गुमान में नहीं
ग़ुलाम हुसैन साजिद
क़र्या-ए-हैरत में दिल का मुस्तक़र इक ख़्वाब है
ग़ुलाम हुसैन साजिद
नुमूद पाते हैं मंज़रों की शिकस्त से फ़तह के बहाने
ग़ुलाम हुसैन साजिद
नशात-ए-फ़त्ह से तो दामन-ए-दिल भर नहीं पाए
ग़ुलाम हुसैन साजिद
नहीं है इस नींद के नगर में अभी किसी को दिमाग़ मेरा
ग़ुलाम हुसैन साजिद
नहीं आसाँ किसी के वास्ते तख़्मीना मेरा
ग़ुलाम हुसैन साजिद
मिल गई है बादिया-पैमाई से मंज़िल मिरी
ग़ुलाम हुसैन साजिद
मिरी विरासत में जो भी कुछ है वो सब इसी दहर के लिए है
ग़ुलाम हुसैन साजिद
मिरी सुब्ह-ए-ख़्वाब के शहर पर यही इक जवाज़ है जब्र का
ग़ुलाम हुसैन साजिद
मता-ए-दीद तो क्या जानिए किस से इबारत है
ग़ुलाम हुसैन साजिद
मता-ए-बर्ग-ओ-समर वही है शबाहत-ए-रंग-ओ-बू वही है
ग़ुलाम हुसैन साजिद
मैं अपने सूरज के साथ ज़िंदा रहूँगा तो ये ख़बर मिलेगी
ग़ुलाम हुसैन साजिद
लरज़ जाता है थोड़ी देर को तार-ए-नफ़स मेरा
ग़ुलाम हुसैन साजिद
लहू की आग अगर जलती रहेगी
ग़ुलाम हुसैन साजिद
कोई जब छीन लेता है मता-ए-सब्र मिट्टी से
ग़ुलाम हुसैन साजिद