Sad Poetry (page 132)

दीवाना-पन और बेकारी मिलती है

फख़्र अब्बास

चेहरे से कब अयाँ है मिरे इज़्तिरार भी

फख़्र अब्बास

बिजली सी इक और गिरा दी ज़ालिम ने

फख़्र अब्बास

तसव्वुर में कोई आया सुकून-ए-क़ल्ब-ओ-जाँ हो कर

फ़ैज़ी निज़ाम पुरी

फिर ज़बान-ए-इश्क़ चश्म-ए-ख़ूँ-फिशाँ होने लगी

फ़ैज़ी निज़ाम पुरी

कुछ ज़िंदगी में लुत्फ़ का सामाँ नहीं रहा

फ़ैज़ी निज़ाम पुरी

कोई तसव्वुर में जल्वा-गर है बहार दिल में समा रही है

फ़ैज़ी निज़ाम पुरी

गुलों के चेहरा-ए-रंगीं पे वो निखार नहीं

फ़ैज़ी निज़ाम पुरी

ग़म-ए-जानाँ के सिवा कुछ हमें प्यारा न हुआ

फ़ैज़ी निज़ाम पुरी

जाने मैं कौन था लोगों से भरी दुनिया में

फ़ैज़ी

रात गहरी है मगर एक सहारा है मुझे

फ़ैज़ी

कोई नाम है न कोई निशाँ मुझे क्या हुआ

फ़ैज़ी

जो दिल को पहले मयस्सर था क्या हुआ उस का

फ़ैज़ी

जानता हूँ कि कई लोग हैं बेहतर मुझ से

फ़ैज़ी

मैं अपनी ख़ुशियाँ अकेले मनाया करता हूँ

फ़ैज़ान हाशमी

इसी जहाज़ के सहरा में डूब जाने की

फ़ैज़ान हाशमी

दुआओं के दिए जब जल रहे थे

फ़ैज़ान आरिफ़

सुब्ह-ए-नौ लाती है हर शाम तुम्हें क्या मा'लूम

फ़ैज़ुल हसन

लोग कहते हैं कि क़ातिल को मसीहा कहिए

फ़ैज़ुल हसन

जाने क्या सोच के उस ने सितम ईजाद किया

फ़ैज़ुल हसन

हम ने सहरा को सजाया था गुलिस्ताँ की तरह

फ़ैज़ुल हसन

एक मुद्दत से सर-ए-बाम वो आया भी नहीं

फ़ैज़ुल हसन

दिल जिस का दर्द-ए-इश्क़ का हामिल नहीं रहा

फ़ैज़ुल हसन

ऐ दिल अच्छा नहीं मसरूफ़-ए-फ़ुग़ाँ हो जाना

फ़ैज़ुल हसन

तमाम हुस्न-ओ-मआ'नी का रंग उड़ने लगा

फ़ैज़ ख़लीलाबादी

लोग कहते हैं बहुत हम ने कमाई दुनिया

फ़ैज़ ख़लीलाबादी

लगा कि जैसे किसी काँपते हिरन को छुआ

फ़ैज़ ख़लीलाबादी

दिन उतरते ही नई शाम पहन लेता हूँ

फ़ैज़ ख़लीलाबादी

बात बन जाए जो तफ़्सील से बातें कर ले

फ़ैज़ ख़लीलाबादी

जागते जागते इक उम्र कटी हो जैसे

फ़ैज़ अनवर