Sad Poetry (page 130)
यूँ तिरी तलाश में तेरे ख़स्ता-जाँ चले
फ़ना निज़ामी कानपुरी
यूँ इंतिक़ाम तुझ से फ़स्ल-ए-बहार लेंगे
फ़ना निज़ामी कानपुरी
या रब मिरी हयात से ग़म का असर न जाए
फ़ना निज़ामी कानपुरी
वो ख़ानुमाँ-ख़राब न क्यूँ दर-ब-दर फिरे
फ़ना निज़ामी कानपुरी
वो जाने कितना सर-ए-बज़्म शर्मसार हुआ
फ़ना निज़ामी कानपुरी
तू फूल की मानिंद न शबनम की तरह आ
फ़ना निज़ामी कानपुरी
साक़िया तू ने मिरे ज़र्फ़ को समझा क्या है
फ़ना निज़ामी कानपुरी
मुझे रुतबा-ए-ग़म बताना पड़ेगा
फ़ना निज़ामी कानपुरी
मुझे प्यार से तिरा देखना मुझे छुप छुपा के वो देखना
फ़ना निज़ामी कानपुरी
मेरे चेहरे से ग़म आश्कारा नहीं
फ़ना निज़ामी कानपुरी
जब मेरे रास्ते में कोई मय-कदा पड़ा
फ़ना निज़ामी कानपुरी
जब भी नज़्म-ए-मै-कदा बदला गया
फ़ना निज़ामी कानपुरी
हुस्न का एक आह ने चेहरा निढाल कर दिया
फ़ना निज़ामी कानपुरी
घर हुआ गुलशन हुआ सहरा हुआ
फ़ना निज़ामी कानपुरी
ग़म हर इक आँख को छलकाए ज़रूरी तो नहीं
फ़ना निज़ामी कानपुरी
इक तिश्ना-लब ने बढ़ के जो साग़र उठा लिया
फ़ना निज़ामी कानपुरी
दुनिया-ए-तसव्वुर हम आबाद नहीं करते
फ़ना निज़ामी कानपुरी
डूबने वाले की मय्यत पर लाखों रोने वाले हैं
फ़ना निज़ामी कानपुरी
दिल से अगर कभी तिरा अरमान जाएगा
फ़ना निज़ामी कानपुरी
चेहरा-ए-सुब्ह नज़र आया रुख़-ए-शाम के बाद
फ़ना निज़ामी कानपुरी
ऐ 'फ़ना' मेरी मय्यत पे कहते हैं वो
फ़ना बुलंदशहरी
ये तमन्ना है कि इस तरह मुसलमाँ होता
फ़ना बुलंदशहरी
वो और होंगे जिन को हरम की तलाश है
फ़ना बुलंदशहरी
उन के जल्वों पे हमा-वक़्त नज़र होती है
फ़ना बुलंदशहरी
तुम हो शरीक-ए-ग़म तो मुझे कोई ग़म नहीं
फ़ना बुलंदशहरी
तुझे ढूँढती हैं नज़रें मुझे इक झलक दिखा जा
फ़ना बुलंदशहरी
तेरी नज़रों पे तसद्दुक़ आज अहल-ए-होश हैं
फ़ना बुलंदशहरी
तिरा ग़म रहे सलामत यही मेरी ज़िंदगी है
फ़ना बुलंदशहरी
निकले वो फूल बन के तिरे गुल्सिताँ से हम
फ़ना बुलंदशहरी
मुझ को दुनिया के हर इक ग़म से छुड़ा रक्खा है
फ़ना बुलंदशहरी