Sharab Poetry (page 6)
कू-ए-जानाँ में अदा देखिए दीवानों की
हीरा लाल फ़लक देहलवी
अश्क-ए-ग़म वो है जो दुनिया को दिखा भी न सकूँ
हीरा लाल फ़लक देहलवी
आरास्ता बज़्म-ए-ऐश हुई अब रिंद पिएँगे खुल खुल के
हीरा लाल फ़लक देहलवी
उम्र भर बहते हैं ग़म के तुंद-रौ धारों के साथ
हज़ीं लुधियानवी
महदूद-निगाही के सनम टूट रहे हैं
हयात वारसी
जो मय-कदे में बहकते हैं लड़खड़ाते हैं
हयात वारसी
दास्तान-ए-फ़ितरत है ज़र्फ़ की कहानी है
हयात वारसी
पर-ए-जिब्रील भी जिस राह में जल जाते हैं
हयात मदरासी
जवाँ रखती है मय देखे अजब तासीर पानी में
हातिम अली मेहर
फ़स्ल-ए-गुल आई तो क्या बे-सर-ओ-सामाँ हैं हम
हातिम अली मेहर
ज़ुल्फ़ अंधेर करने वाली है
हातिम अली मेहर
ज़िक्र-ए-जानाँ कर जो तुझ से हो सके
हातिम अली मेहर
वो ज़ार हूँ कि सर पे गुलिस्ताँ उठा लिया
हातिम अली मेहर
वारिद कोह-ए-बयाबाँ जब में दीवाना हुआ
हातिम अली मेहर
उस ज़ुल्फ़ के सौदे का ख़लल जाए तो अच्छा
हातिम अली मेहर
उस का हाल-ए-कमर खुला हमदम
हातिम अली मेहर
सर झुकाता नहीं कभी शीशा
हातिम अली मेहर
साक़ी है न मय है न दफ़-ओ-चंग है होली
हातिम अली मेहर
पोशाक-ए-सियह में रुख़-ए-जानाँ नज़र आया
हातिम अली मेहर
करते हैं शौक़-ए-दीद में बातें हवा से हम
हातिम अली मेहर
हम से किनारा क्यूँ है तिरे मुब्तला हैं हम
हातिम अली मेहर
गुल-बाँग थी गुलों की हमारा तराना था
हातिम अली मेहर
डुबोएगी बुतो ये जिस्म दरिया-बार पानी में
हातिम अली मेहर
दोपहर रात आ चुकी हीला-बहाना हो चुका
हातिम अली मेहर
चैन पहलू में उसे सुब्ह नहीं शाम नहीं
हातिम अली मेहर
ब-ख़ुदा हैं तिरी हिन्दू बुत-ए-मय-ख़्वार आँखें
हातिम अली मेहर
आलम-ए-हैरत का देखो ये तमाशा एक और
हातिम अली मेहर
उन को रुस्वा मुझे ख़राब न कर
हसरत मोहानी
उन को जो शुग़्ल-ए-नाज़ से फ़ुर्सत न हो सकी
हसरत मोहानी
पैहम दिया प्याला-ए-मय बरमला दिया
हसरत मोहानी