दिल Poetry (page 172)
'रसा' को दिल में रखते हैं 'रसा' के जानने वाले
रसा रामपुरी
रास आया है मुझे वहशत में मर जाना मिरा
रसा रामपुरी
पी के कर लेता हूँ तौबा जब से ये दस्तूर है
रसा रामपुरी
दुश्मन की बात जब तिरी महफ़िल में रह गई
रसा रामपुरी
दिल में किसी को रक्खो दिल में रहो किसी के
रसा रामपुरी
आने को नज़र में मिरी सौ फ़ित्ना-गर आए
रसा रामपुरी
आईना ख़ुद-नुमाई उन को सिखा रहा है
रसा रामपुरी
तुझ से मिलने को बे-क़रार था दिल
रसा चुग़ताई
कौन दिल की ज़बाँ समझता है
रसा चुग़ताई
हाल-ए-दिल पूछते हो क्या तुम ने
रसा चुग़ताई
अल्फ़ाज़ में बंद हैं मआनी
रसा चुग़ताई
ज़िंदगी के सराब भी देखूँ
रसा चुग़ताई
यूँ गँवाता है कोई जान-ए-अज़ीज़
रसा चुग़ताई
तीर जैसे कमान के आगे
रसा चुग़ताई
तेरे आने का इंतिज़ार रहा
रसा चुग़ताई
शाम से पहले घर गए होते
रसा चुग़ताई
रहना हर दम बुझा बुझा सा कुछ
रसा चुग़ताई
मोहब्बत ख़ब्त है या वसवसा है
रसा चुग़ताई
जब भी तेरी यादों का सिलसिला सा चलता है
रसा चुग़ताई
हर चीज़ से मावरा ख़ुदा है
रसा चुग़ताई
अपनी बे-चेहरगी में पत्थर था
रसा चुग़ताई
सर से उतरे नहीं फूल मंज़िल की धुन हम-सफ़र बात सुन
रऊफ़ अमीर
इस उजड़े शहर के आसार तक नहीं पहुँचे
रऊफ़ अमीर
यक़ीनन है कोई माह-ए-मुनव्वर पीछे चिलमन के
रंजूर अज़ीमाबादी
सौदा-ए-सज्दा शाम-ओ-सहर मेरे सर में है
रंजूर अज़ीमाबादी
रोता हमें जो देखा दिल उस का पिघल गया
रंजूर अज़ीमाबादी
मैं और हम-आग़ोश हूँ उस रश्क-ए-परी से
रंजूर अज़ीमाबादी
जनाज़ा धूम से उस आशिक़-ए-जाँ-बाज़ का निकले
रंजूर अज़ीमाबादी
देता है मुझ को चर्ख़-ए-कुहन बार बार दाग़
रंजूर अज़ीमाबादी
ता हश्र रहे ये दाग़ दिल का
रंगीन सआदत यार ख़ाँ
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