दिल Poetry (page 393)

सब की आँखों में जो समाया था

अबु मोहम्मद सहर

फूलों की तलब में थोड़ा सा आज़ार नहीं तो कुछ भी नहीं

अबु मोहम्मद सहर

माना अपनी जान को वो भी दिल का रोग लगाएँगे

अबु मोहम्मद सहर

ख़्वाबों का नश्शा है न तमन्ना का सिलसिला

अबु मोहम्मद सहर

खो के देखा था पा के देख लिया

अबु मोहम्मद सहर

काली ग़ज़ल सुनो न सुहानी ग़ज़ल सुनो

अबु मोहम्मद सहर

काम हर ज़ख़्म ने मरहम का किया हो जैसे

अबु मोहम्मद सहर

हर ख़ौफ़ हर ख़तर से गुज़रना भी सीखिए

अबु मोहम्मद सहर

गोया चमन चमन न था

अबु मोहम्मद सहर

अब तक इलाज-ए-रंजिश-ए-बे-जा न कर सके

अबु मोहम्मद सहर

अपने दिल में आप ही रहता है वो

अबसार अब्दुल अली

तीर-अंदाजों को अंदाज़ा नहीं

अबसार अब्दुल अली

यूँ 'आबरू' बनावे दिल में हज़ार बातें

आबरू शाह मुबारक

उस वक़्त दिल पे क्यूँके कहूँ क्या गुज़र गया

आबरू शाह मुबारक

तुम्हारे दिल में क्या ना-मेहरबानी आ गई ज़ालिम

आबरू शाह मुबारक

तवाफ़-ए-काबा-ए-दिल कर नियाज़-ओ-ख़ाकसारी सीं

आबरू शाह मुबारक

क्यूँ मलामत इस क़दर करते हो बे-हासिल है ये

आबरू शाह मुबारक

किया है चाक दिल तेग़-ए-तग़ाफ़ुल सीं तुझ अँखियों नीं

आबरू शाह मुबारक

जंगल के बीच वहशत घर में जफ़ा ओ कुल्फ़त

आबरू शाह मुबारक

जब सीं तिरे मुलाएम गालों में दिल धँसा है

आबरू शाह मुबारक

इश्क़ का तीर दिल में लागा है

आबरू शाह मुबारक

दूर ख़ामोश बैठा रहता हूँ

आबरू शाह मुबारक

दिवाने दिल कूँ मेरे शहर सें हरगिज़ नहीं बनती

आबरू शाह मुबारक

दिल्ली में दर्द-ए-दिल कूँ कोई पूछता नहीं

आबरू शाह मुबारक

दाग़ सीं क्यूँ न दिल उजाला हो

आबरू शाह मुबारक

आज यारों को मुबारक हो कि सुब्ह-ए-ईद है

आबरू शाह मुबारक

ये तिरी दुश्नाम के पीछे हँसी गुलज़ार सी

आबरू शाह मुबारक

ये सब्ज़ा और ये आब-ए-रवाँ और अब्र ये गहरा

आबरू शाह मुबारक

ये बाव क्या फिरी कि तिरी लट पलट गई

आबरू शाह मुबारक

याद-ए-ख़ुदा कर बंदे यूँ नाहक़ उम्र कूँ खोना क्या

आबरू शाह मुबारक

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