जाम Poetry (page 10)

अन-गिनत शादाब जिस्मों की जवानी पी गया

शबाब ललित

जेहल को इल्म का मेआ'र समझ लेते हैं

शायर लखनवी

आँसू शो'लों में ढल रहे हैं

शायर लखनवी

बिखर जाएगी शाम आहिस्ता बोलो

शानुल हक़ हक़्क़ी

क्या करें गुलशन पे जोबन ज़ेर-ए-दाम आया तो क्या

शाद आरफ़ी

चमन को आग लगाने की बात करता हूँ

शाद आरफ़ी

वो जो फ़िरदौस-ए-नज़र है आईना-ख़ाना अभी

सेहर इश्क़ाबादी

किताब-ए-उम्र में इक वो भी बाब होता है

सीमाब सुल्तानपुरी

रुख़ तिरा माहताब की सूरत

सीमाब बटालवी

क्यूँ जाम-ए-शराब-ए-नाब माँगूँ

सीमाब अकबराबादी

गौतम-बुद्ध

सीमाब अकबराबादी

सुबू पर जाम पर शीशे पे पैमाने पे क्या गुज़री

सीमाब अकबराबादी

इदराक ख़ुद-आश्ना नहीं है

सीमाब अकबराबादी

दिल की बिसात क्या थी निगाह-ए-जमाल में

सीमाब अकबराबादी

आओ फिर गर्मी दयार-ए-इश्क़ में पैदा करें

सीमाब अकबराबादी

हुआ दे कर दबे शो'लों को भड़काया नहीं जाता

सय्यद जहीरुद्दीन ज़हीर

अश्क पीते रहे हर जाम पे हँसते हँसते

सय्यद ज़िया अल्वी

साक़ी गई बहार रही दिल में ये हवस

मोहम्मद रफ़ी सौदा

क्या करूँगा ले के वाइज़ हाथ से हूरों के जाम

मोहम्मद रफ़ी सौदा

यूँ देख मिरे दीदा-ए-पुर-आब की गर्दिश

मोहम्मद रफ़ी सौदा

ने ग़रज़ कुफ़्र से रखते हैं न इस्लाम से काम

मोहम्मद रफ़ी सौदा

मस्त-ए-सहर ओ तौबा-कुनाँ शाम का हूँ मैं

मोहम्मद रफ़ी सौदा

गदा दस्त-ए-अहल-ए-करम देखते हैं

मोहम्मद रफ़ी सौदा

बार-हा दिल को मैं समझा के कहा क्या क्या कुछ

मोहम्मद रफ़ी सौदा

बहार-ए-बाग़ हो मीना हो जाम-ए-सहबा हो

मोहम्मद रफ़ी सौदा

अपने का है गुनाह बेगाने ने क्या किया

मोहम्मद रफ़ी सौदा

साक़ी की हर निगाह में सहबा थी जाम था

सत्यपाल जाँबाज़

ख़ून-ए-दिल से रह-ए-हस्ती को फ़रोज़ाँ कर लें

सत्यपाल जाँबाज़

हमारे दिल में मचलेगी किसी की आरज़ू कब तक

सत्यपाल जाँबाज़

सुब्ह को चैन न हो शाम को आराम न हो

सरवर आलम राज़

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