Ghazal Poetry (page 103)
हो गया पाएमाल आँखों में
सय्यद मोहम्मद असकरी आरिफ़
हाल-ए-बेदारी में रह कर भी मैं ख़्वाबों में रहा
सय्यद मोहम्मद असकरी आरिफ़
ग़म-हा-ए-रोज़गार से फ़ुर्सत नहीं मुझे
सय्यद मोहम्मद असकरी आरिफ़
दिल की धड़कन थम गई दर्द-ए-निहाँ बढ़ता गया
सय्यद मोहम्मद असकरी आरिफ़
दर्द थमता ही नहीं सीने में आराम के बा'द
सय्यद मोहम्मद असकरी आरिफ़
आसमाँ को ज़मीं बनाते हैं
सय्यद मोहम्मद असकरी आरिफ़
ज़िंदगी क्या हर क़दम पर इक नई दीवार है
सय्यद मेराज जामी
ज़मीन फ़र्श फ़लक साएबान लिखते हैं
सय्यद मेराज जामी
शहर में साएबाँ बहुत से हैं
सय्यद मेराज जामी
ख़ाक-दाँ को हासिल-ए-ज़ौक़-ए-नज़र समझा था मैं
सय्यद मेराज जामी
ब-हर-लम्हा पिघलता जा रहा हूँ
सय्यद मेराज जामी
यादश-ब-ख़ैर साया-फ़गन घर ही और था
सय्यद मज़हर जमील
कुछ इस अंदाज़ से हैं दश्त में आहू निकल आए
सय्यद मंज़ूर हैदर
लिखा है गो तेरी क़िस्मत में 'शौकत' चश्म-ए-तर रखना
सय्यद काज़िम अली शौकत बिलगिरामी
जब मैं रोया हूँ वो रोए हैं ये उल्फ़त मेरे साथ
सय्यद काज़िम अली शौकत बिलगिरामी
ये कज-अदाई ये ग़म्ज़ा तिरा कभी फिर यार!
सय्यद काशिफ़ रज़ा
ये कैसी आया-ए-मोजिज़-नुमा निकल आई
सय्यद काशिफ़ रज़ा
वो याद कर भी रहा हो तो फ़ाएदा क्या है
सय्यद काशिफ़ रज़ा
वो सैर-ए-गुल के वास्ते आ ही नहीं रहा
सय्यद काशिफ़ रज़ा
उस पर निगाह फिरती रही और दूर दूर
सय्यद काशिफ़ रज़ा
तू मुझ को चाहता है इस मुग़ालते में रहूँ
सय्यद काशिफ़ रज़ा
था मगर इतना ज़ियादा तो जुनूँ-ख़ेज़ न था
सय्यद काशिफ़ रज़ा
तिरी जुदाई में ये दिल बहुत दुखी तो नहीं
सय्यद काशिफ़ रज़ा
तिरी आँखों को तेरे हुस्न का दर जाना था
सय्यद काशिफ़ रज़ा
तड़प भी है मिरी और बाइस-ए-सुकूँ भी है
सय्यद काशिफ़ रज़ा
सग-ए-जमाल हूँ गर्दन से बाँध कर ले जा
सय्यद काशिफ़ रज़ा
रंग से रास्ता सूरत से पता लेता हूँ
सय्यद काशिफ़ रज़ा
रद्द-ओ-कद के भी ब'अद रह जाए
सय्यद काशिफ़ रज़ा
क़रार दीदा-ओ-दिल में रहा नहीं है बहुत
सय्यद काशिफ़ रज़ा
पुल-ए-सिरात न था दश्त-ए-नैनवा भी न था
सय्यद काशिफ़ रज़ा