Ghazal Poetry (page 102)
गली कूचों में जब सब जल-बुझा आहिस्ता आहिस्ता
सय्यद मुनीर
दिल का दरवाज़ा खुला हो जैसे
सय्यद मुनीर
दर्द का आबशार जारी है
सय्यद मुनीर
अब्र का माहताब का भी था
सय्यद मुनीर
ज़िंदगी की हर नफ़स में बे-कली तेरे बग़ैर
सय्यद मुबीन अल्वी ख़ैराबादी
उन की देरीना मुलाक़ात जो याद आती है
सय्यद मुबीन अल्वी ख़ैराबादी
तुम्हारे आने का जब जब भी एहतिमाम किया
सय्यद मुबीन अल्वी ख़ैराबादी
कैफ़ियत ही कैफ़ियत में हम कहाँ तक आ गए
सय्यद मुबीन अल्वी ख़ैराबादी
जश्न बरबाद ख़यालों का मना लूँ तो चलूँ
सय्यद मुबीन अल्वी ख़ैराबादी
इश्क़ में कुछ इस तरह दीवानगी छाई कि बस
सय्यद मुबीन अल्वी ख़ैराबादी
हो गई उक़्दा-कुशाई तिरे दीवाने से
सय्यद मुबीन अल्वी ख़ैराबादी
बढ़ा तन्हाई में एहसास-ए-ग़म आहिस्ता आहिस्ता
सय्यद मुबीन अल्वी ख़ैराबादी
वो जो मुब्तला है मोहब्बतों के अज़ाब में
सय्यद मुबारक शाह
जैसे किसी को ख़्वाब में मैं ढूँढता रहा
सय्यद मुबारक शाह
तर्क शौक़-ए-शराब क्या करते
सय्यद मोहम्मद ज़फ़र अशक संभली
मिज़ाज-ए-हुस्न में यारब तू प्यार पैदा कर
सय्यद मोहम्मद ज़फ़र अशक संभली
मिला जो ख़ार तो दिल में बिठा लिया मैं ने
सय्यद मोहम्मद ज़फ़र अशक संभली
मलाल होते हुए दिल पे कुछ मलाल नहीं
सय्यद मोहम्मद ज़फ़र अशक संभली
कुछ इस तरह ग़म-ए-उल्फ़त की काएनात लुटी
सय्यद मोहम्मद ज़फ़र अशक संभली
इब्तिदा कितनी मोहब्बत की हसीं होती है
सय्यद मोहम्मद ज़फ़र अशक संभली
फ़िक्र क्यूँ है क़याम करने की
सय्यद मोहम्मद ज़फ़र अशक संभली
दौर-ए-मय है मगर सुरूर नहीं
सय्यद मोहम्मद ज़फ़र अशक संभली
चैन कब आता है घर में तिरे दीवाने को
सय्यद मोहम्मद ज़फ़र अशक संभली
ब-हर-सूरत मोहब्बत का यही अंजाम देखा है
सय्यद मोहम्मद ज़फ़र अशक संभली
ज़ुल्म मुझ पर शदीद कर बैठे
सय्यद मोहम्मद असकरी आरिफ़
तिरे नज़दीक आता जा रहा हूँ
सय्यद मोहम्मद असकरी आरिफ़
मौत है ज़िंदगी ज़िंदगी मौत है
सय्यद मोहम्मद असकरी आरिफ़
मैं ने माना कि मुलाक़ात नहीं हो सकती
सय्यद मोहम्मद असकरी आरिफ़
किस हसीं ख़्वाब का फ़साना है
सय्यद मोहम्मद असकरी आरिफ़
इश्क़ तज्दीद कर के देखते हैं
सय्यद मोहम्मद असकरी आरिफ़