Ghazal Poetry (page 104)

पहलू-ए-ग़ैर में दुख-दर्द समोने न दिया

सय्यद काशिफ़ रज़ा

निगह की शोला-फ़ज़ाई को कम है दीद उस की

सय्यद काशिफ़ रज़ा

मंसब-ए-इश्क़ से कुछ ओहदा-बरा मैं ही हुआ

सय्यद काशिफ़ रज़ा

ख़ुदा हुआ न कोई और ही गवाह हुआ

सय्यद काशिफ़ रज़ा

ख़ैर की नज़्र की है या शर की

सय्यद काशिफ़ रज़ा

जो साँस साँस सही उस सज़ा का नाम न लो

सय्यद काशिफ़ रज़ा

जो हो सका नहीं दरपेश उसे बनाता हुआ

सय्यद काशिफ़ रज़ा

इसी ख़याल से दिल की रफ़ू-गरी नहीं की

सय्यद काशिफ़ रज़ा

इस क़दर ग़ौर से देखा है सरापा उस का

सय्यद काशिफ़ रज़ा

हर एक चीज़ मयस्सर सिवाए बोसा है

सय्यद काशिफ़ रज़ा

फ़क़त क़याम का मतलब गुज़र-बसर कोई है

सय्यद काशिफ़ रज़ा

इक रोज़ ये सर-रिश्ता-ए-इदराक जला दूँ

सय्यद काशिफ़ रज़ा

दिल को तुम्हारे रंज की पर्वा बहुत रही

सय्यद काशिफ़ रज़ा

दिखाई देती है जो शक्ल वो बनी ही न हो

सय्यद काशिफ़ रज़ा

बेवफ़ा था तो नहीं वो, मगर ऐसा भी हुआ

सय्यद काशिफ़ रज़ा

बाँहों में यार हो, कोई फ़ुर्सत की शाम हो

सय्यद काशिफ़ रज़ा

बहुत से दर्द थे पर ख़ुद को जोड़ कर रक्खा

सय्यद काशिफ़ रज़ा

बदन को वज्द तिरे बे-हिसाब-ओ-हद आए

सय्यद काशिफ़ रज़ा

तौर अपना है अलग ईं से अलग आँ से अलग

सय्यद जमील मदनी

ब-फ़ैज़-ए-आगही है मुद्दआ संजीदा संजीदा

सय्यद जमील मदनी

वक़्त-ए-मुश्किल में भी होंटों पर हँसी अच्छी लगी

सय्यद इक़बाल रिज़वी शारिब

मत ख़ुदा ढूँड सवालात के आईने में

सय्यद इक़बाल रिज़वी शारिब

लगा पहचानने मैं रास्ते जब

सय्यद इक़बाल रिज़वी शारिब

कुछ तिरे नाज़-ओ-सितम और उठाना चाहे

सय्यद इक़बाल रिज़वी शारिब

ज़रा न हम पे किया ए'तिबार गुज़री है

सय्यद हामिद

शिकवे ज़बाँ पे आ सकें इस का सवाल ही न हो

सय्यद हामिद

शिकवा गर कीजे तो होता है गुमाँ तक़्सीर का

सय्यद हामिद

फूल चेहरा आँसुओं से धो गए

सय्यद हामिद

पहले था मोहब्बत का गुमाँ सो वो यक़ीं है

सय्यद हामिद

मुस्कुराने से मुद्दआ' क्या है

सय्यद हामिद