Ghazal Poetry (page 105)

मसर्रत में भी है पिन्हाँ अलम यूँ भी है और यूँ भी

सय्यद हामिद

लहू को दिल के जो सर्फ़-ए-बहार कर न सके

सय्यद हामिद

क्यूँ सादगी से उस की तकरार हो गई है

सय्यद हामिद

क्यूँ फ़ना से डरें बक़ा क्या है

सय्यद हामिद

इश्वा क्यूँ दिल-रुबा नहीं होता

सय्यद हामिद

हम से वो बे-रुख़ी से मिलता है

सय्यद हामिद

हक़ किसी का अदा नहीं होता

सय्यद हामिद

फ़र्द को अस्र की रफ़्तार लिए फिरती है

सय्यद हामिद

बात वो बात नहीं है जो ज़बाँ तक पहुँचे

सय्यद हामिद

अक़्ल की जान पर बन आई है

सय्यद हामिद

आँख जो इश्वा-ए-पुर-कार लिए फिरती है

सय्यद हामिद

आई नहीं क्या क़ैद है गुलशन में सबा भी

सय्यद हामिद

आह-ओ-फ़रियाद का असर देखा

सय्यद हामिद

मुझ को तन्हा जो पा रही है रात

सय्यद फ़ज़लुल मतीन

खड़खड़ाता एक पत्ता जब गिरा इक पेड़ से

सय्यद फ़ज़लुल मतीन

जो हो सके तो आप भी कुछ कर दिखाइए

सय्यद फ़ज़लुल मतीन

हमारे ख़्वाब कुछ इनइकास लगता है

सय्यद फ़ज़लुल मतीन

छुट्टी का दिन है चाहिए जैसे गुज़ारिए

सय्यद फ़ज़लुल मतीन

आँखों को चमक चेहरे को इक आब तो दीजे

सय्यद फ़ज़लुल मतीन

आबादियों में खो गया सहराओं का जुनून

सय्यद फ़ज़लुल मतीन

शगुफ़्ता हो के बैठे थे वो अपने बे-क़रारों में

सय्यद फ़रज़नद अहमद सफ़ीर

हाथ में लाठी पकड़ कर इश्क़ फ़रमाएँगे क्या

सय्यद फ़हीमुद्दीन

बक रहा हूँ आज कल हिज़यान बाक़ी ख़ैर है

सय्यद फ़हीमुद्दीन

बन कर जो अंजान गए हैं

सय्यद बासित हुसैन माहिर लखनवी

या तो वो क़ुर्ब था या दूर हुआ जाता हूँ

सय्यद बशीर हुसैन बशीर

तमाशा-गाह-ए-आलम पर्दा-दार रू-ए-ज़ेबा है

सय्यद बशीर हुसैन बशीर

मुझ को दौलत मिली तिरे ग़म की

सय्यद बशीर हुसैन बशीर

हुस्न की हर अदा पे मरता हूँ

सय्यद बशीर हुसैन बशीर

दिल दुखा था मिरा ऐसा कि दिखाया न गया

सय्यद बशीर हुसैन बशीर

ज़ीस्त में कोशिश-ए-नाकाम से पहले पहले

सय्यद आरिफ़ अली