Ghazal Poetry (page 11)
घर नहीं बस्ती नहीं शोर-ए-फ़ुग़ाँ चारों तरफ़ है
ज़ुबैर शिफ़ाई
फ़स्ल की जल्वागरी देखता हूँ
ज़ुबैर शिफ़ाई
चारों तरफ़ हैं ख़ार-ओ-ख़स दश्त में घर है बाग़ सा
ज़ुबैर शिफ़ाई
ज़िंदगी ऐसे घरों से तो खंडर अच्छे थे
ज़ुबैर रिज़वी
वो बाद-ए-गर्म था बाद-ए-सबा के होते हुए
ज़ुबैर रिज़वी
वो आ गया तो सारा परी-ख़ाना जी उठा
ज़ुबैर रिज़वी
तिलिस्म-ए-हर्फ़-ओ-हिकायत उसे भी ले डूबा
ज़ुबैर रिज़वी
था हर्फ़-ए-शौक़ सैद हुआ कौन ले गया
ज़ुबैर रिज़वी
तमाम रास्ता फूलों भरा तुम्हारा था
ज़ुबैर रिज़वी
सितमगरी भी मिरी कुश्तगाँ भी मेरे थे
ज़ुबैर रिज़वी
शौक़ उर्यां है बहुत जिन के शबिस्तानों में
ज़ुबैर रिज़वी
शाम होने वाली थी जब वो मुझ से बिछड़ा था ज़िंदगी की राहों में
ज़ुबैर रिज़वी
शफ़क़-सिफ़ात जो पैकर दिखाई देता है
ज़ुबैर रिज़वी
क़सीदे ले के सारे शौकत-ए-दरबार तक आए
ज़ुबैर रिज़वी
पूछ न हम से कैसे तुझ तक नक़्द-ए-दिल-ओ-जाँ लाए हम
ज़ुबैर रिज़वी
फिर दिल को रोज़ ओ शब की वही ईद चाहिए
ज़ुबैर रिज़वी
पत्थर की क़बा पहने मिला जो भी मिला है
ज़ुबैर रिज़वी
मुझे तुम शोहरतों के दरमियाँ गुमनाम लिख देना
ज़ुबैर रिज़वी
मिलन मौसमों की सज़ा चाहता हूँ
ज़ुबैर रिज़वी
मैं ने कब बर्क़-ए-तपाँ मौज-ए-बला माँगी थी
ज़ुबैर रिज़वी
कुछ दिनों इस शहर में हम लोग आवारा फिरें
ज़ुबैर रिज़वी
कोई चेहरा न सदा कोई न पैकर होगा
ज़ुबैर रिज़वी
ख़ुर्शीद की बेटी कि जो धूपों में पली है
ज़ुबैर रिज़वी
कई कोठे चढ़ेगा वो कई ज़ीनों से उतरेगा
ज़ुबैर रिज़वी
कहाँ मैं जाऊँ ग़म-ए-इश्क़-ए-राएगाँ ले कर
ज़ुबैर रिज़वी
कभी ख़िरद से कभी दिल से दोस्ती कर ली
ज़ुबैर रिज़वी
हम दोनों में कोई न अपने क़ौल-ओ-क़सम का सच्चा था
ज़ुबैर रिज़वी
हम बिछड़ के तुम से बादल की तरह रोते रहे
ज़ुबैर रिज़वी
हम बिछड़ के तुम से बादल की तरह रोते रहे
ज़ुबैर रिज़वी
हम बाद-ए-सबा ले के जब घर से निकलते थे
ज़ुबैर रिज़वी