Ghazal Poetry (page 12)
हवा की अंधी पनाहों में मत उछाल मुझे
ज़ुबैर रिज़वी
हर क़दम सैल-ए-हवादिस से बचाया है मुझे
ज़ुबैर रिज़वी
हमारी गर्दिश-ए-पा रास्तों के काम आई
ज़ुबैर रिज़वी
है धूप कभी साया शोला है कभी शबनम
ज़ुबैर रिज़वी
ग़ुरूब-ए-शाम ही से ख़ुद को यूँ महसूस करता हूँ
ज़ुबैर रिज़वी
दोनों हम-पेशा थे दोनों ही में याराना था
ज़ुबैर रिज़वी
दिल को रंजीदा करो आँख को पुर-नम कर लो
ज़ुबैर रिज़वी
दिल के तातार में यादों के अब आहू भी नहीं
ज़ुबैर रिज़वी
छोड़ कर घर की फ़ज़ा रानाइयाँ पछता गईं
ज़ुबैर रिज़वी
बिछड़ते दामनों में फूल की कुछ पत्तियाँ रख दो
ज़ुबैर रिज़वी
भूली-बिसरी हुई यादों में कसक है कितनी
ज़ुबैर रिज़वी
बरसों में तुझे देखा तो एहसास हुआ है
ज़ुबैर रिज़वी
अपने घर के दर-ओ-दीवार को ऊँचा न करो
ज़ुबैर रिज़वी
तिरी तस्वीर उठाई हुई है
ज़ुबैर क़ैसर
सुब्ह तक बे-तलब मैं जागूँगा
ज़ुबैर क़ैसर
शिकस्ता ख़्वाब मिरे आईने में रक्खे हैं
ज़ुबैर क़ैसर
नज़र नज़र से मिलाओगे मारे जाओगे
ज़ुबैर क़ैसर
कहीं से आया तुम्हारा ख़याल वैसे ही
ज़ुबैर क़ैसर
झुलसती धूप में मुझ को जला के मारेगा
ज़ुबैर क़ैसर
वाक़िआ कोई तो हो जाता सँभलने के लिए
ज़ुबैर फ़ारूक़
साफ़ आईना है क्यूँ मुझे धुँदला दिखाई दे
ज़ुबैर फ़ारूक़
मेरा सारा बदन राख हो भी चुका मैं ने दिल को बचाया है तेरे लिए
ज़ुबैर फ़ारूक़
लोग कहते हैं यहाँ एक हसीं रहता था
ज़ुबैर फ़ारूक़
दिल का ग़म से ग़म का नम से राब्ता बनता गया
ज़ुबैर फ़ारूक़
आँखों में है बसा हुआ तूफ़ान देखना
ज़ुबैर फ़ारूक़
ज़ेहन परेशाँ हो जाता है और भी कुछ तन्हाई में
ज़ुबैर अमरोहवी
फिर घड़ी आ गई अज़िय्यत की
ज़ुबैर अमरोहवी
हम जो गिर कर सँभल जाएँगे
ज़ुबैर अमरोहवी
हर एक लम्हा तिरी याद में बसर करना
ज़ुबैर अमरोहवी
वो पास क्या ज़रा सा मुस्कुरा के बैठ गया
ज़ुबैर अली ताबिश