Ghazal Poetry (page 10)
काम हैं और ज़रूरी कई करने के लिए
ज़ुहूर-उल-इस्लाम जावेद
जितनी भी तेज़ हो सके रफ़्तार कर के देख
ज़ुहूर-उल-इस्लाम जावेद
फ़रज़ाना हूँ और नब्ज़-शनास-ए-दो-जहाँ हूँ
ज़ुहूर-उल-इस्लाम जावेद
फ़लक को फ़िक्र कोई मेहर-ओ-माह तक पहोंचे
ज़ुहूर-उल-इस्लाम जावेद
दानिश-ओ-फ़हम का जो बोझ सँभाले निकले
ज़ुहूर-उल-इस्लाम जावेद
ज़ुल्म तो ये है कि शाकी मिरे किरदार का है
ज़ुहूर नज़र
सहरा में घटा का मुंतज़िर हूँ
ज़ुहूर नज़र
रो लेते थे हँस लेते थे बस में न था जब अपना जी
ज़ुहूर नज़र
रो लेते थे हँस लेते थे बस में न था जब अपना जी
ज़ुहूर नज़र
रो लेते थे हँस लेते थे बस में न था जब अपना जी
ज़ुहूर नज़र
रक्खा नहीं ग़ुर्बत ने किसी इक का भरम भी
ज़ुहूर नज़र
क़हत-ए-वफ़ा-ए-वा'दा-ओ-पैमाँ है इन दिनों
ज़ुहूर नज़र
ख़ुद को पाने की तलब में आरज़ू उस की भी थी
ज़ुहूर नज़र
इश्क़ में मारके बला के रहे
ज़ुहूर नज़र
हयात वक़्फ़-ए-ग़म-ए-रोज़गार क्यूँ करते
ज़ुहूर नज़र
हयात वक़्फ़-ए-ग़म-ए-रोज़गार क्यूँ करते
ज़ुहूर नज़र
हर घड़ी क़यामत थी ये न पूछ कब गुज़री
ज़ुहूर नज़र
दीपक-राग है चाहत अपनी काहे सुनाएँ तुम्हें
ज़ुहूर नज़र
दिन ऐसे यूँ तो आए ही कब थे जो रास थे
ज़ुहूर नज़र
छोड़ कर दिल में गई वहशी हवा कुछ भी नहीं
ज़ुहूर नज़र
शाम-ए-ग़म याद नहीं सुब्ह-ए-तरब याद नहीं
ज़ुहैर कंजाही
फूल का खिलना बहुत दुश्वार है
ज़ुहैर कंजाही
मिरी ज़ात का हयूला तिरी ज़ात की इकाई
ज़ुहैर कंजाही
जीने की है उमीद न मरने की आस है
ज़ुहैर कंजाही
दिल में रक्खा था शरार-ए-ग़म को आँसू जान के
ज़ुहैर कंजाही
बादा-कश हूँ न पारसा हूँ मैं
ज़ुहैर कंजाही
तिलस्माती फ़ज़ा तख़्त-ए-सुलैमाँ पर लिए जाना
ज़ुबैर शिफ़ाई
रात के पिछले पहर इक सनसनाहट सी हुई
ज़ुबैर शिफ़ाई
क़मर-गज़ीदा नज़र से हाला कहाँ से आया
ज़ुबैर शिफ़ाई
जबीं से नाख़ुन-ए-पा तक दिखाई क्यूँ नहीं देता
ज़ुबैर शिफ़ाई