Ghazal Poetry (page 8)
मिरी ख़ाक में विला का न कोई शरार होता
ज़ुल्फ़िकार नक़वी
कूज़ा-गर देख अगर चाक पे आना है मुझे
ज़ुल्फ़िकार नक़वी
ख़ामोश ज़मज़मे हैं मिरा हर्फ़-ए-ज़ार चुप
ज़ुल्फ़िकार नक़वी
दूर तक इक सराब देखा है
ज़ुल्फ़िकार नक़वी
दश्त में धूप की भी कमी है कहाँ
ज़ुल्फ़िकार नक़वी
बे-मुरव्वत हैं तो वापस ही उठा ले शब-ओ-रोज़
ज़ुल्फ़िकार नक़वी
बेचैनी के लम्हे साँसें पत्थर की
ज़ुल्फ़िकार नक़वी
बाल बाल दुनिया पर उस का ही इजारा है
ज़ुल्फ़िकार नक़वी
अँधेरों से उलझने की कोई तदबीर करना है
ज़ुल्फ़िकार नक़वी
ज़िंदगी आज़ार थी आज़ार है तेरे बग़ैर
ज़ुल्फ़िक़ार अली बुख़ारी
ज़िंदगी आज़ार थी आज़ार है तेरे बग़ैर
ज़ुल्फ़िक़ार अली बुख़ारी
वो कहते हैं कि हम को उस के मरने पर तअ'ज्जुब है
ज़ुल्फ़िक़ार अली बुख़ारी
रास आने लगी थी तन्हाई
ज़ुल्फ़िक़ार अली बुख़ारी
गुम-कर्दा-राह ख़ाक-बसर हूँ ज़रा ठहर
ज़ुल्फ़िक़ार अली बुख़ारी
बसाई मैं ने जो क़ल्ब-ए-हज़ीं में
ज़ुल्फ़िक़ार अली बुख़ारी
बसाई मैं ने जो क़ल्ब-ए-हज़ीं में
ज़ुल्फ़िक़ार अली बुख़ारी
आता है नज़र अंजाम कि साक़ी रात गुज़रने वाली है
ज़ुल्फ़िक़ार अली बुख़ारी
असरार बड़ी देर में ये मुझ पे खुला है
ज़ुल्फ़िक़ार अहसन
ये शोर-ओ-शर तो पहले दिन से आदम-ज़ाद में है
ज़ुल्फ़िक़ार अहमद ताबिश
वो सानेहा हुआ था कि बस दिल दहल गए!
ज़ुल्फ़िक़ार अहमद ताबिश
पेड़ों की घनी छाँव और चैत की हिद्दत थी
ज़ुल्फ़िक़ार अहमद ताबिश
नदी किनारे बैठे रहना अच्छा है
ज़ुल्फ़िक़ार अहमद ताबिश
कुछ गुनह नहीं इस में ए'तिराफ़ ही कर लो
ज़ुल्फ़िक़ार अहमद ताबिश
कातता हूँ रात-भर अपने लहू की धार को
ज़ुल्फ़िक़ार अहमद ताबिश
इन लबों से अब हमारे लफ़्ज़ रुख़्सत चाहते हैं
ज़ुल्फ़िक़ार अहमद ताबिश
हम ने सारे हर्फ़ लिखे तो किस के लिए
ज़ुल्फ़िक़ार अहमद ताबिश
हमारे शहर में आने की सूरत चाहती हैं
ज़ुल्फ़िक़ार अहमद ताबिश
बे-सबात सुब्ह शाम और मिरा वजूद
ज़ुल्फ़िक़ार अहमद ताबिश
यूँ जो पलकों को मिला कर नहीं देखा जाता
ज़ुल्फ़िक़ार आदिल
ये रास्ते में जो शब खड़ी है हटा रहा हूँ मुआफ़ करना
ज़ुल्फ़िक़ार आदिल