Ghazal Poetry (page 13)

वैसे तू मेरे मकाँ तक तू चला आता है

ज़ुबैर अली ताबिश

तुम्हारे ग़म से तौबा कर रहा हूँ

ज़ुबैर अली ताबिश

रास्ते जो भी चमक-दार नज़र आते हैं

ज़ुबैर अली ताबिश

पहले मुफ़्त में प्यास बटेगी

ज़ुबैर अली ताबिश

एक पहुँचा हुआ मुसाफ़िर है

ज़ुबैर अली ताबिश

दिल फिर उस कूचे में जाने वाला है

ज़ुबैर अली ताबिश

भरे हुए जाम पर सुराही का सर झुका तो बुरा लगेगा

ज़ुबैर अली ताबिश

बैठे-बैठे इक दम से चौंकाती है

ज़ुबैर अली ताबिश

अब उस का वस्ल महँगा चल रहा है

ज़ुबैर अली ताबिश

कलियाँ चटक रही हैं बहारों की गोद में

ज़ोहरा नसीम

अब दिल है उन के हल्क़ा-ए-दाम-ए-जमाल में

ज़ोहरा नसीम

मौजूद कुछ नहीं यहाँ मादूम कुछ नहीं

ज़ियाउल हसन

क़ुर्बतों के ये सिलसिले भी हैं

ज़िया शबनमी

अपनी तश्हीर करे या मुझे रुस्वा देखे

ज़िया शबनमी

वक़्त ही कम था फ़ैसले के लिए

ज़िया मज़कूर

तुम ने भी उन से ही मिलना होता है

ज़िया मज़कूर

फ़ोन तो दूर वहाँ ख़त भी नहीं पहुँचेंगे

ज़िया मज़कूर

मेरे कमरे में इक ऐसी खिड़की है

ज़िया मज़कूर

कोई भी रस्ता बहुत सोच कर चुनूँगा मैं

ज़िया मज़कूर

इसी नदामत से उस के कंधे झुके हुए हैं

ज़िया मज़कूर

बोल पड़ते हैं हम जो आगे से

ज़िया मज़कूर

बे-सबब उस के नाम की मैं ने

ज़िया मज़कूर

ऐसे उस हाथ से गिरे हम लोग

ज़िया मज़कूर

उन आँखों की हैरत और दबीज़ करूँ

ज़िया-उल-मुस्तफ़ा तुर्क

तुग़्यानी से डर जाता हूँ

ज़िया-उल-मुस्तफ़ा तुर्क

सूरज निकलने शाम के ढलने में आ रहूँ

ज़िया-उल-मुस्तफ़ा तुर्क

सुकूत से भी सुख़न को निकाल लाता हुआ

ज़िया-उल-मुस्तफ़ा तुर्क

रिफ़ाक़त की ये ख़्वाहिश कह रही है

ज़िया-उल-मुस्तफ़ा तुर्क

फिर उसी धुन में उसी ध्यान में आ जाता हूँ

ज़िया-उल-मुस्तफ़ा तुर्क

न थीं तो दूर कहीं ध्यान में पड़ी हुई थीं

ज़िया-उल-मुस्तफ़ा तुर्क