Ghazal Poetry (page 15)
इक दर्द का सहरा है सिमटता ही नहीं है
ज़िया ज़मीर
दर्द की शाख़ पे इक ताज़ा समर आ गया है
ज़िया ज़मीर
दर्द की धूप ढले ग़म के ज़माने जाएँ
ज़िया ज़मीर
बड़े सलीक़े से तोड़ा मिरा यक़ीन उस ने
ज़िया ज़मीर
अब तो आते हैं सभी दिल को दुखाने वाले
ज़िया ज़मीर
आख़िरश कर लिया क़ुबूल हमें
ज़िया ज़मीर
उफ़्ताद तबीअत से इस हाल को हम पहुँचे
ज़िया जालंधरी
तुम्हारी चाहत की चाँदनी से हर इक शब-ए-ग़म सँवर गई है
ज़िया जालंधरी
तिरी निगह से इसे भी गुमाँ हुआ कि मैं हूँ
ज़िया जालंधरी
सोज़-ए-दिल भी नहीं सुकूँ भी है
ज़िया जालंधरी
शम-ए-हक़ शोबदा-ए-हर्फ़ दिखा कर ले जाए
ज़िया जालंधरी
शजर जलते हैं शाख़ें जल रही हैं
ज़िया जालंधरी
शादाब शाख़-ए-दर्द की हर पोर क्यूँ नहीं
ज़िया जालंधरी
रास्ते तीरा सही सीने तो बे-नूर नहीं
ज़िया जालंधरी
रंग बातें करें और बातों से ख़ुश्बू आए
ज़िया जालंधरी
निगाहों में ये क्या फ़रमा गई हो
ज़िया जालंधरी
मुंजमिद होंटों पे है यख़ की तरह हर्फ़-ए-जुनूँ
ज़िया जालंधरी
क्या सरोकार अब किसी से मुझे
ज़िया जालंधरी
कुछ और पिला नशात की मय
ज़िया जालंधरी
कितनी देर और है ये बज़्म-ए-तरब-नाक न कह
ज़िया जालंधरी
कितने इम्काँ थे जो ख़्वाबों के सहारे देखे
ज़िया जालंधरी
ख़ून के दरिया बह जाते हैं ख़ैर और ख़ैर के बीच
ज़िया जालंधरी
ख़ुद को समझा है फ़क़त वहम-ओ-गुमाँ भी हम ने
ज़िया जालंधरी
कश्कोल है तो ला इधर आ कर लगा सदा
ज़िया जालंधरी
कैसे दुख कितनी चाह से देखा
ज़िया जालंधरी
कहाँ का सब्र सौ सौ बार दीवानों के दिल टूटे
ज़िया जालंधरी
जी रहा हूँ प क्या यूँही जीता रहूँ
ज़िया जालंधरी
जब उन्ही को न सुना पाए ग़म-ए-जाँ अपना
ज़िया जालंधरी
गुमाँ था या तिरी ख़ुश्बू यक़ीन अब भी नहीं
ज़िया जालंधरी
फ़ज़ाएँ इस क़दर बे-कल रही हैं
ज़िया जालंधरी