Ghazal Poetry (page 17)
यूँ कहने को पैराया-ए-इज़हार बहुत है
ज़ेहरा निगाह
ये उदासी ये फैलते साए
ज़ेहरा निगाह
ये सच है यहाँ शोर ज़ियादा नहीं होता
ज़ेहरा निगाह
ये क्या सितम है कोई रंग-ओ-बू न पहचाने
ज़ेहरा निगाह
ये हुक्म है कि अँधेरे को रौशनी समझो
ज़ेहरा निगाह
वो जो इक शक्ल मिरे चार तरफ़ बिखरी थी
ज़ेहरा निगाह
वहशत में भी मिन्नत-कश-ए-सहरा नहीं होते
ज़ेहरा निगाह
तिरा ख़याल फ़रोज़ाँ है देखिए क्या हो
ज़ेहरा निगाह
सफ़र ख़ुद-रफ़्तगी का भी अजब अंदाज़ था
ज़ेहरा निगाह
रुक जा हुजूम-ए-गुल कि अभी हौसला नहीं
ज़ेहरा निगाह
रिश्ते से मुहाफ़िज़ का ख़तरा जो निकल जाता
ज़ेहरा निगाह
रौनक़ें अब भी किवाड़ों में छुपी लगती हैं
ज़ेहरा निगाह
रात गहरी थी फिर भी सवेरा सा था
ज़ेहरा निगाह
रात अजब आसेब-ज़दा सा मौसम था
ज़ेहरा निगाह
क़ुर्बतों से कब तलक अपने को बहलाएँगे हम
ज़ेहरा निगाह
नक़्श की तरह उभरना भी तुम्ही से सीखा
ज़ेहरा निगाह
लब पर ख़मोशियों को सजाए नज़र चुराए
ज़ेहरा निगाह
क्यूँ ऐ ग़म-ए-फ़िराक़ ये क्या बात हो गई
ज़ेहरा निगाह
कोई हंगामा सर-ए-बज़्म उठाया जाए
ज़ेहरा निगाह
ख़ुश जो आए थे पशेमान गए
ज़ेहरा निगाह
जुनून-ए-अव्वलीं शाइस्तगी थी
ज़ेहरा निगाह
जो दिल ने कही लब पे कहाँ आई है देखो
ज़ेहरा निगाह
जाँ देना बस एक ज़ियाँ का सौदा था
ज़ेहरा निगाह
इस उम्मीद पे रोज़ चराग़ जलाते हैं
ज़ेहरा निगाह
इस रहगुज़र में अपना क़दम भी जुदा मिला
ज़ेहरा निगाह
हम लोग जो ख़ाक छानते हैं
ज़ेहरा निगाह
हर्फ़ हर्फ़ गूँधे थे तर्ज़ मुश्कबू की थी
ज़ेहरा निगाह
हर ख़ार इनायत था हर इक संग सिला था
ज़ेहरा निगाह
हर आन सितम ढाए है क्या जानिए क्या हो
ज़ेहरा निगाह
हमें तो आदत-ए-ज़ख़्म-ए-सफ़र है क्या कहिए
ज़ेहरा निगाह