Ghazal Poetry (page 16)
इक ख़्वाब था आँखों में जो अब अश्क-ए-सहर है
ज़िया जालंधरी
दुख तमाशा तो नहीं है कि दिखाएँ बाबा
ज़िया जालंधरी
दिल ही दिल में सुलग के बुझे हम और सहे ग़म दूर ही दूर
ज़िया जालंधरी
देखें आईने के मानिंद सहें ग़म की तरह
ज़िया जालंधरी
दे गया दर्द-ए-बे-तलब कोई
ज़िया जालंधरी
छेड़ी भी जो रस्म-ओ-राह की बात
ज़िया जालंधरी
चाँद ही निकला न बादल ही छमा-छम बरसा
ज़िया जालंधरी
अपने अहवाल पे हम आप थे हैराँ बाबा
ज़िया जालंधरी
अजब कशाकश-ए-बीम-ओ-रजा है तन्हाई
ज़िया जालंधरी
ऐ दिल-नशीं तलाश तिरी कू-ब-कू न थी
ज़िया जालंधरी
अब ये आँखें किसी तस्कीन से ताबिंदा नहीं
ज़िया जालंधरी
आँखों में निहाँ है जो मुनाजात वो तुम हो
ज़िया जालंधरी
आज ही महफ़िल सर्द पड़ी है आज ही दर्द फ़रावाँ है
ज़िया जालंधरी
यूँ हसरतों की गर्द में था दिल अटा हुआ
ज़िया फ़तेहाबादी
तू ने नज़रों को बचा कर इस तरह देखा मुझे
ज़िया फ़तेहाबादी
रग-ए-एहसास में नश्तर टूटा
ज़िया फ़तेहाबादी
नज़र नज़र से मिलाना कोई मज़ाक़ नहीं
ज़िया फ़तेहाबादी
मिरे जुनूँ में मिरी वफ़ा में ख़ुलूस की जब कमी मिलेगी
ज़िया फ़तेहाबादी
लो आज समुंदर के किनारे पे खड़ा हूँ
ज़िया फ़तेहाबादी
लब पर दिल की बात न आई
ज़िया फ़तेहाबादी
जुनूँ पे अक़्ल का साया है देखिए क्या हो
ज़िया फ़तेहाबादी
हुस्न है मोहब्बत है मौसम-ए-बहाराँ है
ज़िया फ़तेहाबादी
गो आज अँधेरा है कल होगा चराग़ाँ भी
ज़िया फ़तेहाबादी
फ़रिश्ते इम्तिहान-ए-बंदगी में हम से कम निकले
ज़िया फ़तेहाबादी
दिल अपना सैद-ए-तमन्ना है देखिए क्या हो
ज़िया फ़तेहाबादी
आँख से आँसू ढलका होता
ज़िया फ़तेहाबादी
मिरी आँखों में जो थोड़ी सी नमी रह गई है
ज़िया फ़ारूक़ी
मैं जब भी तिरे शहर-ए-ख़ुश-ए-आसार से निकला
ज़िया फ़ारूक़ी
इश्क़ ने कर दिया क्या क्या सुख़न-आरा तिरे नाम
ज़िया फ़ारूक़ी
अपने होने का हर इक लम्हा पता देती हुई
ज़िया फ़ारूक़ी