Ghazal Poetry (page 14)

मेरे गिर्या से न आज़ार उठाने से हुआ

ज़िया-उल-मुस्तफ़ा तुर्क

कितने ही फ़ैसले किए पर कहाँ रुक सका हूँ मैं

ज़िया-उल-मुस्तफ़ा तुर्क

किसी सफ़र किसी अस्बाब से इलाक़ा नहीं

ज़िया-उल-मुस्तफ़ा तुर्क

कहीं ये लम्हा-ए-मौजूद वाहिमा ही न हो

ज़िया-उल-मुस्तफ़ा तुर्क

जिस भी लफ़्ज़ पे उँगलियाँ रख दे साज़ करे

ज़िया-उल-मुस्तफ़ा तुर्क

दिनों में दिन थे शबों में शबें पड़ी हुई थीं

ज़िया-उल-मुस्तफ़ा तुर्क

चराग़-ए-कुश्ता से क़िंदील कर रहा है मुझे

ज़िया-उल-मुस्तफ़ा तुर्क

आईने के आख़िरी इज़हार में

ज़िया-उल-मुस्तफ़ा तुर्क

माशूक़ जो ठिगना है तो आशिक़ भी है नाटा

ज़ियाउल हक़ क़ासमी

मैं शिकार हूँ किसी और का मुझे मारता कोई और है

ज़ियाउल हक़ क़ासमी

कूचा-ए-यार में मैं ने जो जबीं-साई की

ज़ियाउल हक़ क़ासमी

जब भी तुझे देखा किसी बोहरान में देखा

ज़ियाउल हक़ क़ासमी

दिल के ज़ख़्मों पे वो मरहम जो लगाना चाहे

ज़ियाउल हक़ क़ासमी

जुनून-ए-इश्क़-ए-सर बेदार भी है

ज़ियाउद्दीन अहमद शकेब

ज़िंदगी से थकी थकी हो क्या

ज़िया ज़मीर

ज़र्द पत्ते थे हमें और क्या कर जाना था

ज़िया ज़मीर

ये तो हाथों की लकीरों में था गिर्दाब कोई

ज़िया ज़मीर

उस को जाते हुए देखा था पुकारा था कहाँ

ज़िया ज़मीर

तक रहा है तू आसमान में क्या

ज़िया ज़मीर

सफ़र मुझ पर अजब बरपा रही है

ज़िया ज़मीर

रेज़ा रेज़ा तिरे चेहरे पे बिखरती हुई शाम

ज़िया ज़मीर

राहत-ए-वस्ल बिना हिज्र की शिद्दत के बग़ैर

ज़िया ज़मीर

माना कि यहाँ अपनी शनासाई भी कम है

ज़िया ज़मीर

जो रिश्तों की अजब सी ज़िम्मेदारी सर पे रक्खी है

ज़िया ज़मीर

जिस तरह प्यासा कोई आब-ए-रवाँ तक पहुँचे

ज़िया ज़मीर

जीने में आसानी रख

ज़िया ज़मीर

जाँ का दुश्मन है मगर जान से प्यारा भी है

ज़िया ज़मीर

इतनी शिद्दत से गले मुझ को लगाया हुआ है

ज़िया ज़मीर

इश्क़ जब तुझ से हुआ ज़ेहन के जुगनू जागे

ज़िया ज़मीर

हँसते हँसते भी सोगवार हैं हम

ज़िया ज़मीर