Ghazal Poetry (page 18)
गर्दिश-ए-मीना-ओ-जाम देखिए कब तक रहे
ज़ेहरा निगाह
एक तेरा ग़म जिस को राह-ए-मो'तबर जानें
ज़ेहरा निगाह
एक के घर की ख़िदमत की और एक के दिल से मोहब्बत की
ज़ेहरा निगाह
दिल बुझने लगा आतिश-ए-रुख़्सार के होते
ज़ेहरा निगाह
देर तक रौशनी रही कल रात
ज़ेहरा निगाह
छलक रही है मय-ए-नाब तिश्नगी के लिए
ज़ेहरा निगाह
भूली-बिसरी यादों को लिपटाए हुए हूँ
ज़ेहरा निगाह
बस्ती में कुछ लोग निराले अब भी हैं
ज़ेहरा निगाह
बरसों हुए तुम कहीं नहीं हो
ज़ेहरा निगाह
बैठे बैठे कैसा दिल घबरा जाता है
ज़ेहरा निगाह
अपना हर अंदाज़ आँखों को तर-ओ-ताज़ा लगा
ज़ेहरा निगाह
अब तक शरीक-ए-महफ़िल-ए-अग़्यार कौन है
ज़ेहरा निगाह
यूँ बोली थी चिड़िया ख़ाली कमरे में
ज़ीशान साहिल
याद करने के ज़माने से बहुत आगे हैं
ज़ीशान साहिल
फूलों की अंजुमन में बहुत देर तक रहा
ज़ीशान साहिल
मैं उस की अंजुमन में अकेला नहीं गया
ज़ीशान साहिल
कोई क़ुसूर नहीं मेरी ख़ुश-गुमानी का
ज़ीशान साहिल
किसी की देन है लेकिन मिरी ज़रूरत है
ज़ीशान साहिल
किस क़दर महदूद कर देता है ग़म इंसान को
ज़ीशान साहिल
जो मेरे बस में है उस से ज़ियादा क्या करना
ज़ीशान साहिल
इश्क़ की दीवानगी मिट जाएगी
ज़ीशान साहिल
इस दश्त-ए-बे-पनाह की हद पर भी ख़ुश नहीं
ज़ीशान साहिल
ग़ुबार दिल से निकाला नज़र को साफ़ किया
ज़ीशान साहिल
गर्द-ए-सफ़र में राह ने देखा नहीं मुझे
ज़ीशान साहिल
दिल मुज़्तरिब है और परेशान जिस्म है
ज़ीशान साहिल
ऐसा लगता है जैसे पूरी है
ज़ीशान साहिल
इसी दर से इसी दीवार से आगे नहीं बढ़ता
ज़िशान मेहदी
सर उठाया मज़हबी दीवार पर पटका हुआ
ज़िशान इलाही
रात की ख़ामोशी का माथा ठंका था
ज़िशान इलाही
कैसी ज़मीं सुकून कहाँ का कहाँ की छाँव
ज़िशान इलाही